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________________ गा० ६२] उत्तरपयडिउदीरणाए ठाणाणं एयजीवेण काला इडि० । णवरि बावीसदसिणसम्मासि विस्थिगा इस परिसर कस्स ? अण्णद. मिच्छाइद्विस्म । २५ पवेस० कस्स ? अण्णद० सम्माइट्टि सासणसम्मा० } तेवीस. इगिवीसप्पहाडि जाव एकिस्से पवेस० कस्स ? अण्णद० सम्माइट्टि । एवं मपुसतिए | आदेसेण ऐरइय० २८, २७, २६, २५, २४, २२, २१ ओयं । एवं मन्त्रणेरड्य-तिरिक्ख-पंचिंदियतिरिक्खतिय-देवा भवणादि जाव गवगेवजा ति । पंचिंदियतिरिक्खअपज-मणुसम्मपन्न०-अणुदिसादि सबट्टा ति सबढाणाणि कस्स ? अण्णद० । एवं जाव० । 9 एयजीवेण कालो। २८८. अहियारसंभालणवक्कमेदं । तस्स दुविहो णिहसो मोघादेसभेदेण । तत्थोधपरूवणट्ठमाह * एक्किस्से दोगह तिपहं छपहं गवाहं धारसरह तेरसएहं एगूणवीसराह बोसराहं पयडोणं पवेसगो केवचिरं कालादो होइ ? २८९. सुगर्म । * जहएण्ण एयसमओ। । २९०, तं जहा- एकिस्से पवे० ताव वुच्चदे । उवसमसेढीदो ओदरमाणगो और सम्यग्मिध्यादृष्टिके हते हैं। किन्तु इतनी विशेषता है कि बाईसप्रकृतिक प्रवेशस्थान सासादनसम्यग्दष्टिके भी होता है। २७ प्रकृतिक प्रवेशस्थान किसके होता है ? अन्यनर मिथ्याष्ट्रिक होता है। २५ प्रकृतिक प्रवेशस्थान किसके होता है ? अन्यतर सम्यग्हष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टिके होता है। २३ और २१ से लेकर १ प्रकृतिक प्रवेशस्थान तक सब स्थान किसके होते हैं ? अन्यतर सम्यग्दष्टिके होते हैं। इसी प्रकार ममुज्यत्रिकमें जानना चाहिए । आदेशसे नारकियों में २८, २५, २६, २५, २४, २२ और २१ प्रकृतिक प्रवेशस्थानीका स्वामित्व ओघके समान है। इसी प्रकार सब नारकी, सामान्य तिर्यच, पञ्चेन्द्रिय तिर्यचत्रिक, सामान्य देव और भवनवासियों से लेकर नौ ग्रेवेयकतकके देवों में जानना चाहिए। पझेन्द्रिय तिर्यच अपर्याप्त, मनुष्य अपर्याप्त और अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धितकके देवोंमें यथासम्भव सन प्रवेशस्थान किसके होते हैं ? अन्यसरके होते हैं। इसी प्रकार अनाहारक मार्गणातक जानना चाहिए। * एक जीवकी अपेक्षा कालका अधिकार है। २८. अधिकारकी सम्हाल करनेवाला यह वाक्य है। उसका निर्देश दो प्रकारका है--प्रोध और श्रादेश । उनमेंसे ओघका कथन करने के लिए कहते हैं * एक, दो, तीन, छह, नौ, बारह, तेरह, उनीस और बीम प्रकृतियोंके प्रवेशक जीवका कितना काल है। २८६, यह सूत्र सुगम है। * जघन्य काल एक समय है। $ २६०. यथा-सर्व प्रथम एक प्रकृतिके प्रवेशक का कहते हैं- उपशमश्रेणिसे उतरनेवाला
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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