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________________ १०५ गा. ६२] उत्तरपयडितदीरणाए. वडिपरूषणा २३४. अंतराणु० दुविहो णिसो-ओघेण आदेसे० । प्रोपेण संखे०भागरवि-हाणि-अवट्ठि-अवन. उदीर० भुजगारभंगो । संखेजगुणवडि-हाणी० जह. एग• अंतो०, उक्क० उवढपोग्गल । सधणेर-पंचि निरिक्खअप०-मणुसअप०सन्चदेवा ति भुजगारभंगो। तिरिक्ख-पंचितिरिकातिए भुज भंगो। णवरि तिरिक्खेसु संखेजगुणवडि० जह० पलिदो० असंखे० भागो, उक. उबड्डपोग्गलपरियढें । पंचिंदियतिरिक्खतिए संखेनगुणवड्डी० रणस्थि अंतरं । मणुसतिए भुज मंगो। णवरि संखेगरणवडि-हाणि-अवत्त० जह० अंतोमु०, उक ? पुचकोडिपुवनं । एवं जाव० । उदीषणा करता हुआ अनन्त' समयमें संयत होकर चारकी उदीरणा करने लगता है उसके संख्यातगुणहानिका काल एक समय प्राप्त होनेसे यहाँ इसका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय कहा है। जो किसी भी प्रकृतिको उदीरा नहीं करनेवाला उपशान्तमोह जीव गिर कर पसर्वे गुणस्थानमें एककी उदीरणा करने लगता है, उसके अवतन्य उदोरणाका काल एक समय मात्र प्राप्त होनेसे इसका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय कहा है। मनुष्यत्रिकमें यह ओघ. प्ररूपणा बन जाती है, इसलिए उनमें अोधके समान जाननेकी सूचना की है । मात्र संख्यातगुण वृद्धि उदीरणाका उत्कृष्ट काल अोधप्ररूपणामें दो गतियांकी अपेक्षा घटिन करके बनलाया गया है जो मनुष्यात्रिको सम्भव नहीं है, इसलिए इनमें उक्त पदका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय कहा है। पञ्चेन्द्रिय विर्यचत्रिकमें पांचकी उदारणा करनेवाला जो संयतासंयत जीव मिथ्यात्वम जीकर देसका उदारणा करनालगताई पासमान संख्यातगुणवृद्धिका काल मात्र एक समय प्राप्त होनेसे यहां पर इन तीनों प्रकारके तिर्यञ्चोंमें इस पदका जयन्य और उत्कृष्ट काल एक समय कहा है। शेष कथन भुजगार उदीरणाके समान होनेसे उसे दृष्टिपथमें लाकर यहां घटित कर लेना चाहिए । पुनरुक्तः दोषके भयसे यहां पर हमने उसका अलगसे निर्देश नहीं किया है। २३४. अन्तगनुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । श्रोघसे संख्यातभागबुद्धि, संख्यातभागहानि, अवस्थित और अवक्तव्य उदीरणाका भंग भुजगारउदीरणा के समान है। संख्यानगुणवृद्धि और संख्यातगुणहानिका जघन्य अन्तर क्रमसे एक समय और अन्तर्मुहूर्त है तथा दोनोंका उत्कृष्ट अन्तर उपार्थ पुद्गल परिवर्तनप्रमाण है। सब नारकी, पछेन्द्रिय तिर्यश्च अपर्याप्त, मनुष्य अपर्याप्त और सब देवोंमें भुजगारउदीरणाके समान भंग है। सामान्य तियश्च और पवेन्द्रिय तिर्यश्चत्रिकमें भुजगारदीरणाके समान भंग है। किन्तु इतनी विशेषता है कि सामान्य तिर्यञ्चोंमें संख्यातगुणवृद्धिका जघन्य अन्तर पल्यके असंख्यात भागप्रमाण है और उत्कृष्ट अन्तर सपा पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण है । पञ्चेन्द्रिय तिर्यचत्रिकमें संख्यातगुणवृद्धिका अन्तरकाल नहीं है । मनुष्यत्रिकों भुजगारउदीरणाके समान भंग है। किन्तु इतनी विशषता है कि संख्यातगुणवृद्धि, संख्यातगुण हानि और श्रवक्तव्य उदीरणाका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहते है और उत्कृष्ट अन्तर पूजे-कोटिपृथक्त्वप्रमाण है। इसीप्रकार अनाहारक यार्गणातक जानना चाहिए। विशेषार्थ-जो उपशान्तमोह जीव गिरते समय एककी उदीरणा करता हुआ अनन्तर समयमें दोकी उदीरणा एक समयके अन्तरसे मरकर देवोमें उत्पन्न हो पाठकी उदीरणा करने लगता है उसके संख्यातगुणवृद्धिका जघन्य अन्तर एक समय बन जाता है। तथा जो मिथ्या
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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