SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 105
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गदशव जयधवलासहिदे कसायपाहुडे होदण बिदियसमए कालं कादण देवेसुप्पजिय जहाकममण्णेसु दोसु समएसुस दुगछाप्रो उदीरिय तदो अवविदपवेसनो जादो, लद्भूमंतर होह। * अषसन्धपवेसगंतरं केवचिरं कालादो होदि? २०३. सुगमं । ॐ अहणण अंतोमुत्तं । २०४. तं जहा-उवसमसेडिमारुहिय सन्चोवसामणापडिवादपढमसका अवत्तबस्सादि कादृण हेट्ठा णिवदिय अंतरिदो | पुणो वि सबलहुमंतोमुहूसे उवसमसेढिमारोहणं कादृण सुमाइयचरिचालिसपसरावामानामुलक मिय तत्व कालं कादूण देवेसुषण्ण पढमसमए लद्धमंतर करेदि, पयारंतरेण जहएस, तराणुप्पत्तीदो। ॐ उकस्सेण उबड्डपोग्गलपरिय। २०५. तं कधं ? अद्धपोग्गलपरियदृपढमसमए सम्मत्तमुप्पाइय सव्वलहुमुवसमसेढिसमारोहणपुरस्सरपडिवादेणादि कादणंतरिदो किंचूरगमद्धपोग्गलपरियट्ट परियविदा थोवावसेसे संसारे पृणो वि सन्यविसुद्धो होदृण वसमसेढिमारूढो पडिवादपढमसमए। लद्धमंतरं करेदि त्ति वत्तव्यं । एवमोघपरूवणा र ता। तक अवस्थितपदका अन्नर करके पुनः उत्तरता हुमा सूदमसाम्परायिक होकर तथा दूसरे समा. मरकर और देवोंमें उत्पन्न होकर क्रमसे अन्य दो समयों में भय और जुगुप्साकी उदारणा करके अनन्तर अवस्थितप्रवेशक हो गया। इसप्रकार अवस्थितप्रवेशकका उत्कृष्ट अन्तर प्राप्त हो जाता है। * अवक्तव्यप्रवेशकका अन्तरकाल कितना है? ६२०३. यह सूत्र सुगम है। * जघन्य अन्तर अन्तर्मुहर्त है। २०४. यथा--उपशमश्रेणिपर आगेहप करके नथा सर्वोपशामनासे गिरनेके प्रथम समयमें प्रवक्तव्यपदका प्रारम्भ करके पुनः नीचे गिरकर उसका अन्तर क्रिया । पुनः सबसे लघु अन्तर्मुहर्त कालके द्वारा उपशमश्रेणिपर श्रारोहण करके सूक्ष्मसाम्परायकी अन्तिम श्रावलिके प्रथम समयमें अप्रवेशकभावको प्राप्त होकर और वहीं पर मरकर जो देवों में उत्पन्न हुआ वह वहाँ उत्पन्न होने के प्रथम समयमें अवक्तव्यप्रवेशकसम्बन्धी अन्तरको प्राप्त करता है, क्योंकि प्रकारान्तरसे जघन्य अन्तरकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। * उत्कृष्ट अन्तर उपाधं पुद्गल परिवर्तनप्रमाण है। (२०५. शंका-- बाह कसे ? समाधान--- अर्धपुद्गल परिवर्तनके प्रथम समयमें सम्यक्त्यको उत्पन्न करके प्रतिशोध उपशमश्रेणिपर आरोहण पूर्वक गिरते समय अवक्तव्यपदका प्रारम्भ करके जो उसका अन्वर करता है। पुनः कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तन काल नक परिभ्रमरणकर संसारमें रहनेका थोड़ा काल शष रह जाने पर फिरसे जो सर्व विशुद्ध होकर अपशमश्रणि पर आरोहण करता है वह गिरनेके प्रथम समयमें उसका उत्कृष्ट अन्तर प्राप्त करता है ऐसा यहाँ कहना चाहिए । इस प्रकार ओघप्ररूपण समास हुई। .
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy