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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ बन्धगो ६ विसुद्धपरिणामेणेत्ति भणिदं, मंदसंकिलेसदाए चैव विसोहित्तेण विवक्खियत्तादो । तहा संजोए दूणावलियादीदो पयदजहण्णसामिओ होइ, संजुत्तपढमसमए णवकबंधस्स बंधावलियादीदस्स तत्थ जहण्णभोवेण संकंतिदंसणा दो । तत्तो उवरि सामित्तसंबंधोण कादु सकिजदे, विदियादिसमयसंजुत्तस्स संकिलेस वुडीए वडिदाणुभागबंधस्स तत्थ संकमपाओग्गत्तेण जहण्णभावाणुवलद्धीदो | मिच्छतादीणं व सुहुमस्स हदसमुप्पत्तियकम्मेण वि जहण्णसामित्तमेत्थ किण्ण कीरदे ? ण, तत्थतणचिराणाणुभागसंतकम्मस्स घादिदावसेसस्स एत्तो अनंतगुणत्तेण तहा कादुमसक्कियत्तादो । तदगंत गुणत्तावगमो कुदो ? एदम्हादो चैव सुत्तादो । अण्णा तत्थेव सामित्तविहाणत्तप्पसंगादो । एदेणाणताणुबंधिविसंजोयणा चरिमाणुभागखंडयम्मि जहण्णसामित्तविहाणासंका पडिसिद्धा, तत्थता । णुभागस्स हुमाणुभागादो वि अनंतगुणत्तदंसणा दो । खेदमसिद्धं, सुहुमाणुभागमुवरिं अंतरमकदे दु घादिकम्माणमिदि वयणेण सिद्धसरूवत्तादो । अदो चैव सामित्तविसयाणुभागस्स वि तत्तो बहुत्तमिदि णासंकणिजं, चिराणसंताभावेण णवकबंधमेत्तस्स पयत्तजणिदस्स तत्तो थोवभावसंकमेण णाइयत्तादो अंतोमुहुत्तसंजुत्ते वि सुहुमभ्स हेट्ठदो संतकम्ममिदि सुत्तत्रयणादो च । संजुत्तपढमसमए वि ३४ हैं, क्योंकि मन्द संक्लेशरूप परिणाम ही यहाँ पर विशुद्धिरूपसे विवक्षित किया गया है। उक्त प्रकारसे संयुक्त होकर जिसे एक श्रावलि काल हुआ है वह प्रकृतमें जघन्य स्वामी है क्योंकि संयुक्त होनेके प्रथम समय में जो नवकबन्ध होता है उसका एक आवलिके बाद वहाँ पर जघन्यरूपसे संक्रम देखा जाता है। इससे आगे जघन्य स्वामित्वका सम्बन्ध करना शक्य नहीं है, क्योंकि संयुक्त होनेके द्वितीय आदि समयोंमें संक्लेशकी वृद्धि हो जानेसे अनुभागबन्ध बढ़ जाता है, इसलिए उसमें संक्रमके योग्य जघन्यपना नहीं पाया जाता । शंका —मिथ्यात्व आदि प्रकृतियों के समान सूक्ष्म एकेन्द्रियके हतसमुत्पत्तिक कर्मके साथ भी यहाँ पर जघन्य स्वामित्व क्यों नहीं किया ? समाधान — नहीं, क्योंकि घात करनेसे शेष बचा हुआ वहाँका प्राचीन अनुभागसत्कर्म इससे अनन्तगुणा होता है, इसलिए उसकी अपेक्षा जघन्य स्वामित्व करना शक्य नहीं है । वह अनन्तगुणा है यह किस प्रमाणसे जाना जाता है ? शंका समाधान — इसी सूत्र से जाना जाता है। यदि ऐसा न होता तो वहीं पर स्वामित्वके विधान करनेका प्रसङ्ग आता है । इतने कथनसे अनन्तानुबन्धियोंके विसंयोजनासम्बन्धी अन्तिम अनुभागकाण्डकमें जघन्य स्वामित्व विधानविषयक शंकाका निराकरण हो जाता है, क्योंकि वहाँका अनुभाग सूक्ष्म एकेन्द्रियके अनुभागसे भी अनन्तगुणा देखा जाता है । और यह बात सिद्ध भी नहीं है, क्योंकि 'सुहुमाणुभागमुवरि अंतरमकदे दु घादिकम्माणं' इसबचनसे वह सिद्धस्वरूप ही है । यदि कोई ऐसी आशंका करे कि इस वचनसे तो स्वामित्वविषयक अनुभागका भी उस ( सूक्ष्म एकेन्द्रिय) के अनुभागसे अधिकपना वन जाता है सो ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि प्राचीन सत्कर्मका अभाव होनेसे प्रयत्नजनित जो नवकबन्ध होता है उसका उससे स्तोकरूपसे संक्रम होना उचित है तथा 'संयुक्त होनेके अन्तर्मुहूर्त बाद भी सत्कर्म सूक्ष्म एकेन्द्रियके
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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