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________________ उत्तरपयडिअणुभागसंकमे सामित्तं * सम्मामिच्छत्तस्स जहण्णाणुभागसंकामओ को होइ ? ८७. सुगमं । गा० ५८ ] ३३ * चरिमाणुभाग़खंडयं संछुहमा । § cc. दंसणमोहक्खत्रणाए दुचरिमादिहेट्टिमाणुभागखंडयाणि संकामिय पुणो सम्मा मिच्छत्तचरिमाणुभागखंडए वावदो जो सो पयदजहण्णसामिओ होइ, तत्तो हेट्ठा सम्मामिच्छत्तसंबंधिजहण्णाणुभागसंकमाणुवलंभादो । * अणंताणुबंधीणं जहणणाणुभागसंकामओ को होइ ? ८६. सुगमं । * विसंजोएदृण पुणो तप्पा ओग्गविसुद्ध परिणामेण संजोएदूणावलि - यादोदो । ६०. किमडमेसो विसंजोयणाए १ पुणो जोयणाए पयट्टाविदो १ विद्वाणाणुभागसंतकम्मं सर्व्वं गालिय णत्रकधाणुभागे जहण्णसामित्तविहाणङ्कं । तत्थ वि असंखेज लोगमेत्तपडवादट्ठा तप्पा ओग्गजहण्णसंकिले साणु विद्धपरिणामेण संजुत्तो त्ति जाणावणङ्कं तप्पा ओग्ग * सम्यग्मिथ्यात्वके जघन्य अनुभागसंक्रमका स्वामी कौन है ? ७. यह सूत्र सुगम है । * अन्तिम अनुभागकाण्डकका संक्रम करनेवाला जीव सम्यग्मिथ्यात्वके जघन्य अनुभाग संक्रमका स्वामी है । ९८८. दर्शनमोहनीयकी क्षपणाके समय द्विचरिम आदि अधस्तन अनुभागकाण्डका संक्रम करके जो सम्यग्मिथ्यात्यके अन्तिम अनुभागकाण्डकमें व्यापृत है वह प्रकृतमें जघन्य स्वामी होता है, क्योंकि उससे पहले सम्यग्मिथ्यात्वसम्बन्धी जघन्य अनुभागसंक्रम नहीं उपलब्ध होता । * अनन्तानुबन्धियोंके जघन्य अनुभागसंक्रमका स्वामी कौन है ? 8. यह सूत्र सुगम है । * विसंयोजनाके बाद पुनः तत्प्रायोग्य विशुद्ध परिणाम से उनकी संयोजना करके जिसे एक आवलि काल हुआ है वह अनन्तानुबन्धियोंके जघन्य अनुभागसंक्रमका स्वामी है। ६०. शंका -विसंयोजनाके बाद इसे पुनः संयोजनामें क्यों प्रवृत्त कराया है ? समाधान - सब द्विस्थानिक अनुभागसत्कर्मको गलाकर नवकबन्धसम्बन्धी अनुभागमें जघन्य स्वामित्वका विधान करनेके लिए विसंयोजना के बाद इसे पुनः संयोजनायें प्रवृत्त कराया है । उसमें भी असंख्यात लोक प्रमाण प्रतिपातस्थानों में से यह तत्प्रायोग्य जघन्य संक्लेशसम्बन्धी परिणामसे संयुक्त है इस बातका ज्ञान करानेके लिए 'तप्पा ओग्गविसुद्ध परिणामेण ' यह वचन कहा १. श्रा० प्रतौ विसंयोजणा ता० प्रतौ विसंजोयणा [ ए ] इति पाठः । ሂ
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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