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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ बंयगो ६ ९८३. कुदो १ तेणेवाणुभागेण सव्त्रत्थुष्पत्तीए पडिसेहाभावादो | दंसणमोहक्खवयस्स चरिमाणुभागखंड मिच्छत्तजहण्णसामित्तं किण्ण दिष्णं ? तत्थतणाणुभागस्स एत्तो अनंतगुणत्तादो । कधमेदं परिच्छिण्णं १ एदम्हादो चेत्र सामित्तसुत्तादो । * एवमट्ठएणं कसायाणं । ३२ ८४. जहा मिच्छत्तस्स सुहुमेह दियहदसमुप्पत्तियकम्मेणण्णदरजीवम्मि जहण्णाणुभागसंकमसा मित्तमेवमट्ठकसा याणं पि कायन्त्रं, विसेसाभावादो । खायचरिमफालीए विसुद्धयरकरणपरिणामेहि घादिदावसिट्ठाणुभागस्स जहण्णभावो जुज त्ति रोहासंका कायन्त्रा, अंतरकरणादो हेट्ठा खवगाणुभागस्स सुहुमाणुभागं पेक्खिऊणाणंतगुणत्तणियमादो । * सम्मत्तस्स जहण्णाणुभागसंकामो को होइ ? ८५. सुगमं । * समयाहियावलियमक्खीणदंसणमोहणी । ९८६. कुदो एदस्स जहण्गभावो, १ पत्तसव्वुकस्सघादत्तादो अणुसमयोवणाए अजहणीकयत्तादो च । ८३. क्योंकि उसी अनुभागके साथ सर्वत्र उत्पत्ति होनेमें कोई निषेध नहीं है । शंका – दर्शनमोहनीयके क्षपकके अन्तिम अनुभागकाण्डकके शेष रहने पर मिध्यात्वक जघन्य स्वामित्व क्यों नहीं दिया गया ? समाधान क्योंकि वहाँका अनुभाग सूक्ष्म एकेन्द्रियसम्बन्धी हतसमुत्पत्तिक अनुभागसे अनन्तगुण होता है । शंका- यह कैसे जाना ? समाधान- इसी स्वामित्व सूत्रसे जाना । * इसीप्रकार आठ कषायोंका जघन्य स्वामित्व जानना चाहिए । ८४. जिस प्रकार सूक्ष्म एकेन्द्रियके हतसमुत्पत्तिक कर्मके साथ स्थित अन्यतर जीवमें मिथ्यात्वके जघन्य अनुभागसंक्रमका स्वामित्व दिया है उसी प्रकार आठ कषायोंका भी करना चाहिए, क्योंकि उससे इनके कथनमें कोई विशेषता नहीं है। यदि कोई ऐसी आशंका करे कि विशुद्धतर करणरूप परिणामोंके द्वारा क्षपककी अन्तिम फालिमें घात होकर शेष बचे हुए अनुभागका जघन्यपना बन जाता है सो उसकी ऐसी आशंका करना भी ठीक नहीं है, क्योंकि अन्तरकरणकं पूर्व क्षपकसम्बन्धी अनुभाग सूक्ष्म एकेन्द्रियसम्बन्धी अनुभागकी अपेक्षा अनन्तगुणा होता है ऐसा नियम है । * सम्यक्त्वके जघन्य अनुभागसंक्रमका स्वामी कौन है ? ८५. यह सूत्र सुगम है । * जिसके दर्शनमोहनीयकी क्षपणा में एक समय अधिक एक आवलि काल शेष है वह सम्यक्त्वके जघन्य अनुभागसंक्रमका स्वामी है । ८६. क्योंकि यहाँ पर अनुभागका सबसे उत्कृष्ट घात प्राप्त हो गया है। तथा प्रत्येक समयमें होनेवाली अपवर्तनासे यह अत्यन्त जघन्य कर लिया गया है, इसलिए इसका जघन्यपना बन जाता ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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