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________________ ४४४ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ बंधगो ६ वयणेण संतकम्मपक्खेवपमाणविसयो सम्ममवगमो ण जादो त्ति पुणो वि विसेसिऊण संतकम्मपक्खेव पमाणावहारण उवरिमसुत्तायारो * जो जहण्णगो पक्खेवो जहण्णए कम्मसरीरे तदो जो च जहपणगे कम्मे विदियसंक मट्ठाणविसेसो सो असंखेज्जगुणो । ९ ७३५. एत्थ जहण्णए कम्मसरीरे ति बयणेण अधापवत्तकरणचरिमसमयजहणसंतकम्मस्स गहणं कायव्यं । कम्मस्स सरीरं कम्मसरीरमिदि कम्मक्खंधस्सेव विवविखयतादो । तत्थ जो जहण्णगो पक्खेवो त्ति कुत्ते बिदियसं कमट्ठाणपरित्राडिणिबंधणसंतकम्मपक्खेवस्स गहणं कायव्वं । किमेसो संतकम्मपक्खेवो बहुओ, किं वा जहण्णए चैत्र कम्मे जं विदियं संकमट्ठाणं तस्स विसेसो बहुगो ति एवंविहासंकाए णिरारेगीकरणमिदं बुच्चदे - 'तदो जो च जहण्णए कम्मे' इच्चादि । एतदुक्तं भवति - तदो संतकम्मपक्खेवादो जहण्णसंतकम्मस्सा संखेज लोगपडिभागियादो जो जहगए कम्मे संका मिजमोणे विदियसंकमा णस्स विसेसो सो असंखेजगुणो होइ ति । तं जहा-जहण्णसंकमट्ठा णमसंखेज लोगेहि खंडेऊरोग खंडे तत्थेव पडिरासिय पक्खित्ते पढमपरिवा डिबिदिय संक मट्ठाणमुपदि । एत्थ पक्खित्तमेय खंडप माणबिदिय कमाविसेसो णाम । एवंविहसंक मट्ठाणविसेसे पुणो वि तप्पा ओग्गासंखेज लोगमेत्त सामान्य वचन द्वारा सत्कर्मके प्रक्षेपका प्रमाण कितना है यह ठीक तरहसे नहीं जाना जाता है। इसलिए फिर भी विशेषरूपसे सत्कर्मके प्रक्षेप प्रमाणका निश्चय करने के लिए आगे सूत्रका अवतार करते हैं जघन्य सत्कर्ममें जो जघन्य प्रक्षेप है, उससे जघन्य सत्कर्म में जो दूसरा संक्रमस्थानविशेष है, वह असंख्यातगुणा है । ६७३५. यहाँ पर जघन्य कर्मशरीर इस वचनसे अधःप्रवृत्तकरण के अन्तिम समयमें प्राप्त हुए जघन्य सत्कर्मका प्रहण करना चाहिए, क्योंकि कर्मका शरीर वह कर्मशरीर इस प्रकार इस पद द्वारा कर्मस्कन्ध ही विवक्षित किया गया है । उसमें जो जघन्य प्रक्षेप है ऐसा कहने पर द्वितीय संक्रमस्थान परिपाटीके कारणभूत सत्कर्मके प्रक्षेपका ग्रहण करना चाहिए। क्या यह संक्रमप्रक्षेप बहुत है या क्या जघन्य कर्ममें ही जो दूसरा संक्रमस्थान है उसका विशेष बहुत है इस प्रकारकी आशंका होने पर उसका निराकरण करनेके लिए यह कहते हैं-तदो जो च जहणए कम्मे इत्यादि । यह उक्त कथनका तात्पर्य है कि उस सत्कर्मप्रक्षेपसे, जघन्य सत्कर्मके असंख्यात लोकभाग अधिक जघन्य सत्कर्मके संक्रमित होने पर जो द्वितीय संक्रमस्थानका विशेष प्राप्त होता है, वह असंख्यात गुणा होता है । यथा - जघन्य संक्रमस्थान विशेषको असंख्यात लोकों से भाजित कर जो एक खण्ड प्राप्त हो उसे उसी जघन्य संक्रमस्थान में मिला देने पर प्रथम परिपाटीका दूसरा संक्रमस्थान उत्पन्न होता है । यहाँ पर मिलाया गया एक खण्डका प्रमाण द्वितीय संक्रमस्थानका विशेष है । इस प्रकार के संक्रमस्थान विशेषको फिर भी तत्प्रायोग्य असंख्यात लोकप्रमाण संख्यासे भाजित
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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