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________________ गा० ५८] मत्तरपयडिपदेससंकमे संकमट्ठाणाणि ४४५० स्वेहि भागे हिदे भागलद्धमेत्तो संतकम्मपक्खेवो ति भण्णदे । जइ वि विदियसंकमट्ठाणविसेसस्सासंखेजदिभागो ति सुत्ते सामण्णेण परूविदं तो वि तस्सासंखेजलोगपडिभागिओ ति णबदे वक्खाणादो। ७३६. संपहि जहण्णसंतकम्ममस्सिऊण संतकम्मपक्खेवपमाणमाणिजदे । तं जहाएगमेइ दियसमयपबद्धं ठविय दिवड्डगुणहाणीए गुणिदे एइ दियजहण्णसंतकम्ममागच्छदि । पुणो अंतोमुहुत्तेणोवट्टिदोकड कडणभागहारो तस्स भागहारत्तेण ठवेयव्यो। एवं ठविदे असण्णिपंचिदिएसु देवेसु च उक्कड्डिददव्वमागच्छदि । एवमुक्कड्डिददव्वं बेछोपट्टिकालब्भंतरे गालेदि ति तत्कालभंतरणाणागुणहाणिसलागाओ विरलिय विगं करिय अण्णोण्णब्भत्थरासिणा तम्मि ओवट्टिदे एतियमेत्तकालगलिदावसेसमधापवत्तकरणचरिमसनयजहण्णसंतकम्ममागच्छदि । एत्तो अधापवत्तकरणचरिमसमए संकामिददव्यमिच्छामो ति अंगुलस्सासंखेजभागमेत्तविज्झादमागहारेण तम्मि भागे हिदे जहण्णसंकमट्ठाणमुप्पजदि । पुणो तम्मि तप्पाओग्गासंखेजलोगमेत्तभागहारेणोपट्टिदे विदियसंकमट्ठाणविसेसो होइ । पुणो अण्णेणासंखेजलोगभागहारेण तम्मि भाजिदे संतकम्मपक्खेवपमाणमागच्छदि ति णिच्छओ कायो । तदो एवंविहसंतकम्मपक्खेवे पडिरासिदजहण्णसंतकम्मस्सुवरि पक्खित्ते विदियसंकमट्ठाणपरिवाडिणिमित्तभूदमसंखेजलोगभागुत्तरविदियसंतकम्गट्ठाणमुप्पजदि ति सिद्धं । करने पर जो भाग लब्ध प्रावे तत्प्रमाण सत्कर्मप्रक्षेप कहा जाता है । यद्यपि वह द्वितीय संक्रमस्थान विशेषका असंख्यातवां भागप्रमाण है ऐसा सूत्र में सामान्य रूपसे कहा गया है तो भी वह असंख्यात लोकसे भाजित होकर एक भागप्रमाण है यह बात व्याख्यानसे जानी जाती है। ६७३६. अब जघन्य सत्कर्मका आश्रय लेकर सत्कर्मके प्रक्षेपका प्रमाण लाते हैं । यथाएकेन्द्रियसम्बन्धी एक समयप्रबद्धको स्थापित कर द्वयर्ध गुणहानिसे गुणित करने पर एकेन्द्रिय सम्बन्धी सत्कम आता है। पुनः अन्तमुहूतेसे भाजित अपकर्षण-उत्कर्षणभागहारको उसके भागहाररूपसे स्थापित करना चाहिए । इस प्रकार स्थापित करने पर असंज्ञी पञ्चेन्द्रियोंमें और देवोंमें उत्कर्षणको प्राप्त हुआ द्रव्य आता है। इस प्रकार उत्कर्षित हुए द्रव्यको दो छयासठ सागर कालके भीतर गलाता है इसलिए उस कालके भीतर प्राप्त हुई नाना गुणहानिशलाकाओंका विरलन करके और विरलित राशिके प्रत्येक एकको दुना करके परस्पर गुणा करनेसे जो राशि उत्पन्न हो उससे उसके भाजित करने पर इतने कालके भीतर गलाकर जो राशि शेष बचती है तत्प्रमाण अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमें जघन्य सत्कर्म आता है । अब इसमेंसे अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमें संक्रमित होनेत्राला द्रव्म लाना चाहते हैं इसलिए अंगुलके असंख्यातवें भागप्रमाण विध्यात भागहारके द्वारा उसके भाजित करने पर जवन्य संक्रमस्थान उत्पन्न होता है। पुनः उसमें तत्प्रायोग्य असंख्यात लोकप्रमाण भागहारका भाग देने पर द्वितीय संक्रमस्थानके विशेषका प्रमाण होता है। पुनः अन्य असंख्यात लोकप्रमाण भागहारका उसमें भाग देने पर सत्कर्मप्रक्षेपका प्रमाण आता है ऐसा यहाँ निश्चय करना चाहिए । इस लिए इस प्रकारके सत्कर्मप्रक्षेपको प्रतिराशिभूत जघन्य सत्कर्मके ऊपर प्रक्षिप्त करने पर द्वितीय संक्रमस्थान परिपाटीका निमित्तभूत असंख्यात लोकसे भाजति
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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