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________________ गा०५८] उत्तरपयडिपदेससंकमे संकमट्ठाणाणि ४४३ ___ ७३३. तदो पुव्वणिरुद्धजहण्णसंतट्ठाणादो पदेसुत्तरे संतकम्मे जादे तत्थ वि ताणि चेव पढमपरिवाडीए परूविदाणि असंखेजलोगमेत्तसंकमट्ठाणाणि समुप्पछति । कि कारणं १ तहाभूदसंतकम्मवियप्पस्स संकमट्ठाणतरुप्पत्तीए अणिमित्तत्तादो । एवं दुपदेसुत्तरे वा तिपदेसुत्तरे वा चदुपदेसुत्तरे वा पंचपदेसुत्तरे वा संखेजपदेसुत्तरे वा असंखेजपदेसुत्तरे वा अणंतपदेसुत्तरे वा जहण्गए संतकम्मे तोणि चेत्र संकमट्ठाणाणि समुप्पजंति ति घेत्तव्वं । एवमणंतभागवड्डीए गंतूण जहण्णसंतकम्मट्ठाणं जहण्णपरित्ताणतेण खंडेऊण तत्थेयखंडमेत्तपरमाणुसु तत्थ वहिदेसु वि ताणि चे संकमट्ठाणाणि पुणरुत्ताणि समुप्पजति त्ति ऐसो एदस्स भावत्थो। ® असंखेळलोगभागे पक्खित्ते विवियसंकमाणपरिवाडी होइ । ६७३४. एतदुक्तं भवति-जहण्णसंतकम्मट्ठाणं तप्पाओग्गासंखेजलोगेहिं भागं घेतूण मागलद्धे तत्थे पडिरासिय पक्खित्ते जं संतकम्मट्ठाणमुप्पजदि तत्तो परिणामट्ठाणाणि अस्सिऊण पढमसंजमट्ठाणपरिवाडी परिणामट्ठाणमेत्तायामा समुप्पजदि ति एदेण असंखेजभागवविविसए वि अणंताणि संतकम्मड्डाणाणि उज्लंघिऊण तदित्थतिसए पयदसंतकम्मट्ठाणुप्पत्ती होदि त्ति जाणाविदं। संपहि 'असंखेजलोगभागे पक्खित्ते' इच्चेदेण सामण्ण. ६७३३. 'तदो' अर्थात् पूर्वमें विवक्षित जघन्य सत्कर्मस्थानसे एक प्रदेश अधिक सत्कर्मके होने पर वहाँ पर भी वे ही प्रथम परिपाटीमें कहे गये असख्यात लोकप्रमाण संक्रमस्थान उत्पन्न होते हैं, क्योंकि उस प्रकारके सत्कर्मके भेदमें अन्य संक्रमस्थानकी उत्पत्तिका नियम नहीं है । इस प्रकार दो प्रदेश अधिक, तीन प्रदेश अधिक, चार प्रदेश अधिक, पाँच प्रदेश अधिक, संख्यात प्रदेश अधिक, असंख्यात प्रदेश अधिक या अनन्त प्रदेश अधिक जघन्य सत्कर्ममें वे ही संक्रमस्थान उत्पन्न होते हैं ऐसा ग्रहण करना चाहिए । इस प्रकार अनन्त भागवृद्धिके साथ जाकर जघन्य सत्कर्मस्थानको जघन्य परीतानन्तसे भाजित कर वहाँ पर प्राप्त हुए एक खण्डमात्र परमाणु उस जघन्य सत्कर्ममें मिलाने पर भी वे ही पुनरुक्त संक्रमस्थान उत्पन्न होते हैं यह इस सूत्रका भावार्थ है। * असंख्यात लोकभाग प्रमाण द्रव्यके प्रक्षिप्त करने पर दूसरी संक्रमस्थान परिपाटी होती है। ६७३४. यह तात्पर्य है कि जघन्य सत्कर्मस्थानमें तत्प्रायोग्य असंख्यात लोकका भाग देने पर जो एक भाग लब्ध आवे उसे उसी राशिमें प्रक्षिप्त करने पर जो सत्कर्मस्थान उत्पन्न होता है उससे परिणामस्थानोंका आश्रय लेकर प्रथम संक्रमस्थान परिपाटीके आगे परिणामस्थानप्रमाण आयामवाली दूसरी संक्रमस्थानपरिपाटी उत्पन्न होती है । इस प्रकार इस सूत्र द्वारा असंख्यात भागवृद्धिके विषयमें भी अनन्त सत्कर्मस्थानोंको उल्लंघन कर वहाँ प्राप्त हुए विषयमें प्रकृत सत्कर्मस्थानकी उत्पत्ति होती है यह ज्ञान कराया गया है । अव 'असंखेज्जलोगभागे पक्खित्ते' इस १. ता० प्रतौ 'टाणतप्पा- इति पाठः ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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