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________________ गा०५८] उत्तरपयडिपदेससंकमे पदणिक्खेवो ४११ फलविसेसाणुवलद्धीदो । ण तत्थ गुणसेढिणिजराए बहुदव्वविणासो आसंकणिजो, तत्तो गुणसंक्रमेण पडिच्छिन्ञ्जमाणदव्वस्सासंखेजगुणत्तदंसणादो। तदो सई पि कसाए अणुवसामेण सेसगुणसेढिणिजराहिं वहुसो परिणामिऊण पुणो एइदिएसु गदस्स खविदकम्मसियस्स पलिदोवमासंखेजभागमेत्तकालेण गालिदासेसगुणसेढिणिज्जराकालभंतरसंगलिदसमयपबद्धस्स जाधे संकमपाओग्गभावेण ढुक्कमाणतप्पाओग्गजहण्णेइदियसमयपबद्धण सह सरिसी णिज्जरा जादा ताधे चदुण्हं संजलणाणं जहण्णवड्वि-हाणि-अवट्ठाणसामित्ताहिसंबंधो ति सुसंबद्धमेदं सुत्तं । * पुरिसवेदस्स जहएिणया वड्डी हाणी अवट्ठाणं च कस्स ? ६६८०. सुगम । ® जम्हि अवट्ठाणं तम्हि तप्पाओग्गजहएणएण कम्मेण जहणिया वड्डी वा हाणी वा अवठ्ठाणं वा । ६६८१. जम्हि विसये पुरिसवेदपदेससंकमस्सावट्ठाणसंभवो तम्हि तप्पाओग्गजहण्णएण कम्मेण सह वट्टमाणयस्स पयदजहण्णवहि:हाणि-अवट्ठाणसामित्तसंबंधो दट्टयो । कि कारणं ? अवविदपाओग्गविसये असंखेजलोगपडिभागेण जहण्णवडि-हाणि-अवट्ठाणाणमुवलंमे विरोहाभावादो । सेसं सुगनं । उपलब्ध नहीं होता और इसलिए वहाँ पर गुणश्रेणि निर्जराके द्वारा बहुत द्रव्यके विनाशकी आशंका करना ठीक नहीं है, क्योंकि उससे गुणसंक्रमके द्वारा प्रतिग्रहरूपसे प्राप्त होनेवाला द्रव्य असंख्यातगुणा देखा जाता है । इसलिए एक बार भी कषायोंको नहीं उपशमा कर तथा शेष द्रव्यको गुणश्रेणि निर्जराके द्वारा बहुत बार परिणमा कर पुनः एकेन्द्रियोंमें मर कर उत्पन्न हुए उस क्षपितकर्मा शिक जीवके पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण कालके द्वारा निर्जीण की गई समस्त गुणश्रेणिनिर्जराओंके कालके भीतर समयप्रबद्धोंको निजीण करने पर जब संक्रमके योग्यरूपसे प्राप्त होनेवाले तत्प्रायोग्य एकेन्द्रियसम्बन्धी समयप्रबद्धके समान निर्जरा होती है तब चारों संज्वलनोंकी जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थानके स्वामित्वका सम्बन्ध होता है इसलिए यह सूत्र सुसम्बद्ध है। * पुरुषवेदकी जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान किसके होता है ? ६६८०. यह सूत्र सुगम है। * जहाँ पर अवस्थान होता है वहाँ पर तत्प्रायोग्य जघन्य कर्मके साथ जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान होता है। ६६८१. जिस विषयमें पुरुषवेदके प्रदेशसंक्रमका अवस्थान सम्भव है वहाँ पर तत्प्रायोग्यजघन्य कर्मके साथ विद्यमान हुए जीवके प्रकृत जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थानके स्वामित्वका सम्बन्ध जान लेना चाहिए, क्योंकि अवस्थितपदके योग्य विषयमें असंख्यात लोकप्रमाण प्रतिभागके कारण जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थानके प्राप्त होने में कोई विरोध नहीं आता । शेष कथन सुगम है।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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