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________________ ४०६ जयधवला सहिदे कसायपाहुडे [ बंधगा ६ आगंतूण पंचिदिए समयाविरोहेणुप्पन्जिय सव्वलहु सम्मत्तं घेत्तणाणताणुबंधीणं विसंजोयणापुव्त्रमंतोमुहुत्तेण पुणो वि संजुत्तो जादो । किमदुमेत्थ विसंजोयणापुत्रं पुणो संतभावो कीरदे ? ण, अनंताणुबंधीणं विसंजोयणाए णिस्तीभावं काढूण पुणो संजुत्तस्स थोरदव्यं घेण जहण्णसामित्तविहाण तहाकरणादो । जइ एवं, एवं दियज हण्णसंतकम्मावलंवणमणत्थयं, विसंजोएदूण विणा सिञ्जमा णाणमणंताणुबंधीणं संतकम्मस्स जहण्णभावे फलविसावलंभादो ? ण एस दोसो, सेसक साएहिंतो अधापवत्तसंकमेण पडिछिनमाण - 'दव्यस्स जहण्णभावविहाणडुमेह' दियजहण्णसंत कम्मावलंबणादो। 'तदो ताव गालिदा ० 'सरिसी जादा' त्ति एदस्सत्थो - तदो विसंजोयणापुव्त्रसंजोगादो अनंतर मेइ दिएस पविसिय तात्र गालिदा अनंताणुबंधिणो जाव तेसिं गलिदावसि । णमधापवत्तणिजरा अधट्ठिदिणिजरा जहण्णेण एइ दियसमयपबद्धेण जहण्णोवबाद जोगपडिबद्धेण समाणा जादा ति । एतदुक्त ं भवति -- विसंजोयणाषु व्वसंजोगेणेइ दिए पविट्ठस्स अणतारणुबंधी - मदिरा एह दियसयपबद्धादो थोत्रयरा होंति ताव गालेयव्त्रा जाव पडिसमयमेइ दियसंचयवसेण अहिकय गोबुच्छाविसये जहण्णएण एवं दियसमयपबद्धेण सरिसत्त' पत्ता पञ्चेन्द्रियोंमें समय के अविरोध पूर्वक उत्पन्न होकर तथा अतिशीघ्र सम्यक्त्वको ग्रहण कर अनन्तानुबन्धियोंकी विसंयोजनापूर्वक अन्तर्मुहूर्तमें पुनः उनसे संयुक्त हुआ । शंका – यहाँ पर विसंयोजनापूर्वक पुनः संयुक्त किसलिए कराया है ? समाधान नहीं, क्योंकि अनन्तानुबन्धियोंकी विसंयोजना द्वारा उन्हें निःसत्त्व करके पुनः संयुक्त हुए जीवके स्तोकतर द्रव्यको ग्रहण कर जघन्य स्वामित्वका विधान करने के लिए इस प्रकार किया है। शंका- यदि ऐसा है तो एकेन्द्रियसम्बन्धी जघन्य सत्कर्मका अवलम्बन करना निरर्थक है, क्योंकि विसंयोजना करके विनाशको प्राप्त होनेवाली अनन्तानुबन्धियों के सत्कर्मके जघन्यपने में विशेष फल नहीं उपलब्ध होता ? समाधान - यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि शेष कषायोंमेंसे अधःप्रवृत्तसंक्रमके द्वारा संक्रमित होनेवाले द्रव्यको जघन्य करनेके लिए एकेन्द्रियसम्बन्धी जघन्य सत्कर्मका अवलम्बन लिया है । 'तो ताब गालिदा० सारिसी जादा' इसका अर्थ- 'तदो' अर्थात् विसंयोजनापूर्वक संयोगके बाद एकेन्द्रियों में प्रवेश कराकर अनन्तानुबन्धियोंको तबतक गलाया जब जाकर गलितावशिष्ट उनकी अधःप्रवृत्त निर्जरा अर्थात् अधः स्थितिगलनरूप निर्जरा जघन्य उपपादयोग के सम्बन्धसे एकन्द्रियसम्बन्धी जघन्य समयप्रबद्ध के समान हो गई। इसका यह तात्पर्य है कि विसंयोजना पूर्व संयोग के बाद एकेन्द्रियोंमें प्रविष्ट हुए जीव के अनन्तानुबन्धियोंकी अधः स्थितिगलन रूप निर्जरा एकेन्द्रियसम्बन्धी समयप्रबद्ध से स्तोकतर होती है, इसलिए उन्हें तब तक गलाना चाहिए जब जाकर प्रत्येक समयमें एकेन्द्रियोंमें हुए सञ्चयके कारण अधिकृत गोपुच्छाका आश्रय कर वह एकेन्द्रियसम्बन्धी जघन्य समयप्रबद्ध के समान हो जाती है ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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