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________________ जयधयलासहिददे कसायपाहुडे [ बंधगो ६ - ९ ३७. कालो दुविहो – जह० उक० । उकस्से पयदं । दुविहो णिद्देसो, ओघेण आदेसेण य | मोह० उक० अणु० अणुभागसंकमो विहत्तिभंगो । ३८. जहण्णए पयदं । दुविहो णिद्देसो- ओषेण आदेसेण य । ओघेण मोह ० जह० अणुभागसंकम ० के ० १ जह० उक्क० एयसमओ । अज० तिणि भंगा । तत्थ जो सो सादिओ सपञ्जवसिदो, जह० अंतोमु०, उक्क० तेत्तीसं सागरो० सादिरेयाणि । मणुसतिए जह० अणुभागसंक० जह० उक्क० एयसमओ । अज० अणुभागसंक० जह० एयसमओ, उक्क० सगट्टिदी | सेसमग्गणासु विहत्तिभंगो । १४ पर पाया जाता है । यह अवस्था श्रोघसे तो सम्भव है ही, मनुष्यत्रिमें भी सम्भव है, क्योिं मनुष्यत्रिक ही क्षपकश्र ेणि पर आरोहण करते हैं, इसलिए मनुष्यत्रिमें तो श्रघप्ररूपणा के समान ही स्वामित्वके जाननेकी सूचना की है। मात्र अन्य गतियों में यह व्यवस्था नहीं बन सकती, इसलिए उनमें अनुभागविभक्तिके जघन्य स्वामित्वके समान जाननेकी सूचना की है। ९ ३७. काल दो प्रकारका है— जघन्य और उत्कृष्ट । उत्कृष्टसंक्रमका प्रकरण है । निर्देश दो प्रकारका है - और आदेश । श्रघसे मोहनीय के उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट अनुभागसंक्रमके जघन्य और उत्कृष्ट कालका भङ्ग अनुभागविभक्तिके समान है । विशेषार्थ — उत्कृष्ट अनुभागबन्ध होकर एक आवलिके बाद अनुभागकाण्डकघात द्वारा उसका अन्तर्मुहूर्तमें संक्रम हो सकता है, इसलिए से इसका जंवन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त प्राप्त होता है। तथा उत्कृष्ट बाद अनुत्कृष्ट होने पर वह कम से कम अन्तर्मुहूर्त तक और अधिक से अधिक ऐसे जीवके एकेन्द्रिय पर्यायमें चले जाने पर अनन्तकाल तक रहता है, इसलिए श्रवसे मोहनीयके अनुत्कृष्ट अनुभागसंक्रमका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अनन्तकालप्रमाण कहा है। सामान्य तिर्योंमें यह काल इसी प्रकार बन जाता है । मात्र इनमें उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट श्रनुभागसंक्रमका जघन्य काल एक समय प्राप्त होता है, क्योंकि जो अन्य गतिका जीव जीवनके अन्तमें उत्कृष्ट अनुभागका संक्रम कर रहा है उसके उस संक्रममें एक समय काल शेष रहनेपर यदि वह मर कर तिर्यश्चों में उत्पन्न हो जाता है तो सामान्य तिर्यश्नों में उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमका जघन्य काल एक समय बन जाता है। तथा जो तिर्यन जीवन के अन्तमें एक समय शेष रहने पर अनुत्कृष्ट अनुभागका संक्रम करता है उसके अनुत्कृष्ट अनुभागसंक्रमका जघन्य काल एक समय बन जाता है । इसी प्रकार अन्य गतियोंमें भी अनुभागविभक्तिके अनुसार काल घटित हो जाता है, इसलिए यहाँ पर उक्त सब मार्गणाओं में उत्कृष्ट कालको अनुभागविभक्ति के समान जाननेकी सूचना की है। ३८. जघन्यका प्रकरण है । निर्देश दो प्रकारका है - श्रघ और आदेश । श्रघसे मोहनीयके जघन्यं श्रनुभागसंक्रमका कितना काल है ? जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है । जघन्य अनुभागसंक्रमके तीन भङ्ग हैं। उनमें जो सादि- सान्त भङ्ग है उसका जघन्य काल अन्तहूर्त है और उत्कृष्ट काल साधिक तेतीस सागर है । मनुष्यत्रिकमें जघन्य अनुभागसंक्रमका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है । जघन्य अनुभागसंक्रमका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अपनी अपनी काय स्थितिप्रमाण है । शेष मार्गणाओं में अनुभागविभक्तिके समान भङ्ग है । विशेषार्थ - श्रघसे मोहनीयका जघन्य अनुभागसंक्रम दसवें गुणास्थानमें क्षपकके एक समय के लिए होता है, इसलिए इसका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय कहा है। तथा जो क्षायिक सम्यग्दृष्टि प्रथम बार उपशम खिसे उतर कर अन्तर्मुहूर्त में पुनः उपशमणि पर आरोहण कर उपशान्तमोह गुणस्थानको प्राप्त होता है उसके अन्य अनुभागसंक्रमका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त और जो क्षायिक सम्यग्दृष्टि यह विधि साधिक तेत्तीस सागरके अन्तरसे करता है उसके श्रजघन्य
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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