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________________ गा० ५८] अणुभागसंकमें अंतरपरूवणा ३६ अंतरं दुविहं-जह० उक्क० । उकस्से पयदं। दुविहो णिसो—ओघेण आदेसेण य । ओषेण मोह० उक्क० अणुभागसंकमंतरं जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० अणंतकालमसंखेजा पोग्गलपरियट्टा । अणु० जह० एयसमओ, उक्क० अंतोमु० । सेसमग्गणासु विहत्तिभंगो। ४० जहण्गए पयदं । दुविहो णिद्देसो-ओघेण आदेसेण य। ओघेण मोह० जह० णत्थि अंतरं । अज० जह० एयसमओ, उक्क० अंतोमुहुत्तं । मणुसतिए मोह० जह० णस्थि अंतरं । अज० जह० उक्क० अंतोमुहुत्तं । सेसमग्गणासु विहत्तिभंगो । अनुभागसंक्रमका उत्कृष्ट काल साधिक तेतीस सागर प्रमाण प्राप्त होनेसे यह दोनों प्रकारका काल उक्तप्रमाण कहा है। मनुष्यत्रिक अजघन्य अनुभागसंक्रमके उत्कृष्ट कालको छोड़कर शेष सब काल ओघके समान ही घटित कर लेना चाहिए। मात्र अजघन्य अनुभागसंक्रमका उत्कृष्ट काल अपनीअपनी कायस्थितिके प्रारम्भमें और अन्तमें उपशमश्रेणिपर आरोहण करानेसे कुछ कम अपनी-अपनी कायस्थितिप्रमाण प्राप्त होता है, इसलिए यह उक्त प्रमाण कहा है। शेष गतिमार्गणाओंमें काल अनुभागविभक्तिके समान यहाँ बन जानेसे उसे उसके समान जाननेकी सूचना की है। ____६३६. अन्तर दो प्रकारका है-जघन्य और उत्कृष्ट । उत्कृष्टका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है-श्रोध और आदेश । ओघसे मोहनीयके उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर अनन्तकाल है जो असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण है। अनुत्कृष्ट अनुभागसंक्रमका जवन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। शेष मार्गणाओंमें अनुभागविभक्तिके समान भङ्ग है। विशेषार्थ-एक बार मोहनीयके उत्कृष्ट अनुभागबन्धके रुकनेके बाद पुनः उत्कृष्ट अनुभाग बन्ध अन्तर्मुहूर्त के पहले नहीं होता ऐसा नियम है, अतः यहाँ पर ओघसे उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त कहा है। तथा जो संज्ञी पञ्चेन्द्रिय पर्याप्त जीव उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम करके एकेन्द्रियों में उत्पन्न होकर अनन्त कालके बाद पुनः संज्ञी पञ्चेन्द्रिय होकर उत्कृष्ट अनुभागबन्धपूर्वक उसका संक्रम करता है उसके उसका उत्कृष्ट अन्तरकाल अनन्तकाल देखा जाता है, अतः ओघसे उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमका उत्कृष्ट अन्तर अनन्तकाल कहा है। कोई क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानमें एक समयके लिए मोहनीयके अनुत्कृष्ट अनुभाग असंक्रामक होकर दूसरे समयमें मरकर देव होकर पुनः उसका संक्रामक हो जाय यह भी सम्भव है और कोई अन्य जीव मोहनीयके उत्कृष्ट अनुभागका अन्तर्मुहूर्त काल तक संक्रम करता रहे यह भी सम्भव है, इसलिए यहाँ पर मोहनीयके अनुत्कृष्ट अनुभागके संक्रामकका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त कहा है। शेष मार्गणाओंमें अनुभागविभक्तिके समान भङ्ग है यह स्पष्ट ही है। ४०. जघन्यका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है-श्रोध और आदेश। ओघ से मोहनीयके जघन्य अनुभागसंक्रमका अन्तरकाल नहीं है । अजघन्य अनुभागसंक्रमका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। मनुष्यत्रिकमें मोहनीयके जघन्य अनुभागसंक्रमका अन्तरकाल नहीं है। अजवन्य अनुभागसंक्रमका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। शेष मार्गणाओं में अनुभागविभक्तिके समान भङ्ग है।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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