SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 403
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३७६ - जयधवला सहिदे कसाय पाहुडे * पुरिसवेदस्स सम्बत्थोवा अवक्तव्वसंकामया । ५८९. सुगमं । [ बंधगो ६ * दिसंकामया असंखेज्जगुणा । $ ५९०. कुदो ? पलिदोवमासंखेज भागमेत्तसम्माइट्टिजीवाणं पुरिसवेदावट्ठिद संकमपजाएण परिणदाणमुवलंभादो । * भुजगार संकमया अतगुणा । $ ५९१. सगबंध कालब्भंतरसंचिदेइंदियरासिस्स गहणादो । * अप्पयर संकामया संखेज्जगुणा । ९.५९२. पडिवक्खबंधगद्धा गुणगारस्स तप्यमाणत्तोवलंभादो । 'सयवेद-अरइ- सोगाणं सव्वत्थोवा भवत्तव्य संकामया । $ ५९३ . संखेजोवसामयजीवविसयत्तादो । * अप्पयरसंकामया अांतगुणा । $ ५९४. किं कारणं ? अंतोमुहुत्तमेत्तपडिवक्खबंधगद्धा संचि देइंदियरा सिस्स समवलंबणादो । * भुजगार संकामया संखेज्जगुणा । * पुरुषवेदके अवक्तव्य संक्रामक जीव सबसे स्तोक हैं । ९ ५८६. यह सूत्र सुगम है। 1 * उनसे अवस्थित संक्रामक जीव असंख्यातगुणे हैं । ५०. क्योंकि पुरुषवेदकी अवस्थित संक्रामक पर्यायरूपसे परिणत ऐसे पल्यके असंख्यातभागप्रमाण सम्यग्दृष्टि जीव उपलब्ध होते हैं । * उनसे भुजगार संक्रामक जीव अनन्तगुणे हैं । ५१. क्योंकि अपने बन्धकालके भीतर सञ्चित हुई एकेन्द्रिय जीवराशिको यहाँ पर ग्रहण किया है । * उनसे अन्पतर संक्रामक जीव संख्यातगुणे हैं । $ ५२. क्योंकि प्रतिपक्ष बन्धककालका गुणकार तत्प्रमाण उपलब्ध होता है । * नपुंसकवेद, अरति और शोकके अवक्तव्यसंक्रामक जीव सबसे स्तोक हैं । ५३. क्योंकि संख्यात उपशामक जीव इस पदके विषय हैं । * उनसे अन्पतर संक्रामक जीव अनन्तगुणे हैं । § ५६४. क्योंकि अन्तर्मुहूर्त प्रमाण प्रतिपक्षबन्धक काल के भीतर सचित हुई एकेन्द्रिय जीवराशिका यहाँ पर अवलम्बन लिया है । * उनसे भुजगार संक्रामक जीव संख्यातगुणे हैं ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy