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________________ गा०५८] उत्तरपयडिपदेससंकमे भुजगारो ३७७ ६ ५६५. कुदो ? एदेसि कम्माणं पडिवक्खबंधगद्धादो सगबंधकालस्स संखेजगुणतोवलंभादो। एवमोघप्पाबहुअं समत्तं । ६५६६. आदेसेण णेरइयदंसणतियमोघं । अणताणु०४ सव्वत्योवा अवत्त०संका० । अबढि०संका. असंखेजगुणा । अप्प०संका० असंखे०गुणा । भुज संका० संखे०गुणा । एवं बारसक०-भय-दुगुछा० । णवरि अवत्त० णत्थि । पुरिसवे० सबस्थोवा अट्ठि०संका० । भुज०संका० असंखे०गुणा। अप्पसंका० संखे०गुणा । एकमित्थीवेद-हस्स-रदि०। णवरि अबढि०संका० णत्थि। णवूस०-अरदि-सोग० सव्वत्थोवा अप्प०संका० । भुज०संका० संखे०गुणा । एवं सत्रणेरइय-पंचिंदियतिरिक्खतिय-देवगइदेवा भवणादि जाव सहस्सार ति। पंचितिरिक्खअपज०-मणुस. अपज. णारयभंगो । णवरि सम्म-सम्मामि०-अणंताणु०४ अवत्त० पुरिसवे० अबढि० पत्थि । मिच्छत्तस्स असंकामया । तिरिक्खाणमोघं । णवरि बारसक० णवणोक० अवत्त० पत्थि । ६५६७. मणुसेसु मिच्छ० सव्वत्थोवा अवट्ठि० संका० । अवत्त०संका० संखे०. ६५६५. क्योंकि इन कर्मोंका प्रतिपक्ष बन्धककालसे अपना बन्धककाल संख्यात गुणा उपलब्ध होता है। इस प्रकार ओघ अल्पबहुत्व समाप्त हुआ। ६५६६. आदेशसे नारकियोंमें दर्शनमोहनीयत्रिकका भङ्ग ओघके समान है। अनन्तानुबन्धियोंके अवक्तव्य संक्रामक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अवस्थित संक्रामक जीव असंख्यात गुणे हैं। उनसे अल्पतर संक्रामक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे भुजगार संक्रामक जीव संख्यात गुणे हैं । इसी प्रकार बारह कषाय, भय और जुगुप्साकी अपेक्षासे जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इनका अवक्तव्यपद नहीं है । पुरुषवेदके अवस्थित संक्रामक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे भुजगार संक्रामक जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे अल्पतर संक्रामक जीव संख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार स्त्रीवेद, हास्य और रतिकी अपेक्षासे जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इनके अवस्थित संक्रामक जीव नहीं हैं। नपुंसकवेद, अरति और शोकके अल्पतर संक्रामक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे भजगारासंक्रामक जीव संख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार सब नारकी, पञ्चेन्द्रिय तिर्यचत्रिक, देवगतिमें देव और भवनवासियोंसे लेकर सहस्रार कल्पतकके देवों में जानना चाहिए । पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च अपर्याप्त और मनुष्य अपर्याप्तक जीवोंमें नारकियोंके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि इनमें सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धीचतुष्कका अवक्तव्य पद तथा पुरुषवेदका अवस्थितपद नहीं है। तथा ये मिथ्यात्वके असंक्रामक होते हैं। सामान्य तिर्यञ्चोंमें ओघके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि बारह कषाय और नौ नोकषायोंका अवक्तव्यपद नहीं है। ६५६७. मनुष्योंमें मिथ्यात्वके अवस्थित संक्रामक जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे अवक्तव्य संक्रामकजीव संख्यातगुणे हैं। उनसे भुजगार संक्रामक जीव संख्यातगुणे हैं। उनसे अल्पतर संक्रामक ४८
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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