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________________ ३६४ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ बंधगो ६ अवत्त० संका० जह० एयस०, उक्क० संखेजा समया । सेसं सम्बद्धा । इथिवेद०. णवंसवे०-चदुणोक० ओघं । एवं मणुसपज०-मणुसिणी० । जम्हि आवलि० असंखे० भागो तम्हि संखेजा समया। सम्म०-सम्मामि० भुज० संका. जह० एयस० उक्क० अंतोमु० । मणुस-अपज. सधपयडी० सव्वपदसंका० जह० एयस०, उक्क० पलिदो० असंखे०मागो। णवरि सोलसक०- भय-दुगुंछा० अबढि० जह० एयस०, आवलि. असंखेमागो। ५४०. अणुदिसादि सबट्ठा ति मिच्छ०-सम्मामि०-इत्थिवेद० णवंस० अप्प० संका० सम्बद्धा । अणंताणु०४ भुज० संका० जह• अंतोमु०, उक्क० पलिदो० असंखे० भागो । अप्प० संका० सम्बद्धा । बारसक०-पुरिसवे० उण्णोक० देवोघं । णवरि सव्वं? जम्मि आवलि० असंखे भागो तम्मि संखेजा समया । अणंताणु० चउक्क. भुज० संका० जह० उक० अंतोमु० । एवं जाव। पाणाजोवेहि अंतरं। ६ ५४१. एत्तो गाणाजीवविसेसिदमंतरं भुजगारादि संकामयविसयमणुवत्तइस्सामो ति अहियारसंभालणवक्कमेदं । है कि अवक्तव्यसंक्रामकोंका भङ्ग मिथ्यात्वके समान है। पुरुषवेदके अवस्थित और प्रवक्तव्यसंक्रामकोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्टकाल संख्यात समय है। शेष पदोंके संक्रामकोंका काल सर्वदा है। स्त्रीवेद, नपुंसकवेद और चार नोकषायोंका भङ्ग ओघके समान है। इसीप्रकार मनुष्य पर्याप्त और मनुष्यिनियोंमें जानना चाहिए । मात्र जहाँ आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण काल कहा है वहाँ संख्यात समय काल जानना चाहिए । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके भुजगारसंक्रामकोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तमहर्त है। मनुष्य अपर्यापकोंमें सब प्रकतियों के सब पदसंक्रामकोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण है। इतनी विशेषता है कि सोलह कषाय, भय और जुगुप्साके अवस्थितसंक्रामकोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण है। ६५४०. अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धि तकके देवोंमें मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व, स्त्रीवेद और नपुंसकवेदके अल्पतर संक्रामकोंका काल सर्वदा है। अनन्तानुबन्धीचतुष्कके भुजगार संक्रामकोंका जघन्य काल अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट काल पेल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण है। अल्पतर संक्रामकोंका काल सर्वदा है। बारह कषाय, पुरुषवेद और छह नोकषायोंका भङ्ग सामान्य देवोंके समान है। इतनी विशेषता है कि जहाँ आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण काल कहा है वहाँ सर्वार्थसिद्धिमें संख्यात समय काल कहना चाहिए। अनन्तानुबन्धीचतुष्कके भुजगार संक्रामकोंका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा तक जानमा चाहिए। * अब नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तरका अधिकार है। ६५४१. अब आगे भुजगार आदि पदोंका संक्रामक करनेवाले नाना जीवों सम्बन्धी अन्तरको बतलाते हैं इस प्रकार अधिकार की सम्हाल करनेवाला यह वाक्य है।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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