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________________ गा० ५८] उत्तरपयडिपदेससंकमे भजगारो ३६१ ५३३. तिरिक्खेसु मिच्छ० भुज० अवढि०-अवत्त० संकाम० लोग० असंखे० भागो। अप्प०संका० लोग० असंखे० भागो छ चोइस० (देसूणा ) । सम्म०सम्मामि० भुज० अप्प०संको० लोग. असंखे०भागो, सव्वलोगो वा । अवत्त०संका० लोग० असंखे भागो, सत्त चोदस० ( देसूणा )। सोलसक०.णणोक० सवपदसंका० सबलोगो । णवरि अणंताणु०४ अवत्त० पुरिसवे० अवढि०संका० लोग० असंखे० भागो। ६५३४. पंचिंदियतिरिक्खतिए मिच्छ०-सम्म०-सम्मामि० तिरिक्खोघं । सोलसक० णवणोक० सयपदसंका० लोग. असंखे०भागो, सव्वलोगो वा । णवरि अणंताणु० चउक्क० अवत्त० पुरिसवे० अवट्टि. इत्थिवे. भुज० लोग० असंखे०भागो। पुरिसवे० भुज० लोग० असंखे० भागो, छ चोइस० ( देसूणा)। एवं मणुसतिए । णवरि मिच्छ० अप्प० पुरिसवे. भुज० बारसक० णवणोक० अवत्त० लोग० असंखे० भागो। पंचि० तिरिक्ख अपज०-मणुसअपज० सत्तावीसं पयडीणं सवपदसं० लो० असंखे० भागो, सव्वलोगो वा । णवरि इत्थिवेद० पुरिसवेद भुज० संका० लोग० असंखे० भागो। mmmmmm ६५३३. तिर्यञ्चोंमें मिथ्यात्वके भुजगार, अवस्थित और अवक्तव्यसंक्रामक जीवोंने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। अल्पतरसंक्रामक जीवोंने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और त्रसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । सम्यक्त्व और सम्यग्मि यात्वके भुजगार और अल्पतर संक्रामक जीवोंने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और सर्व लोकक स्पर्शन किया है। प्रवक्तव्य संक्रामकोंने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और त्रसनालीके कुछ कम सात बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पशेन किया है। सोलह कषाय और नौ नोकषायोंके सब पदोंके संक्रामकोंने सब लोकका स्पर्शन किया है। इतनी विशेषता है कि अनन्तानुबन्धीचतुष्कके प्रवक्तव्य संक्रामकोंने और पुरुषवेदके अवस्थितसंक्रामकोंने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। ६५३४. पवेन्द्रिय तिर्यञ्चत्रिकमें मिथ्यात्व, सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका भङ्ग सामान्य तिर्यञ्चोंके समान है। सोलह कषाय और नौ नोकषायोंके सब पदोंके संक्रामकोंने लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण क्षेत्रका और सब लोकका स्पर्शन किया है। इतनी विशेषता है कि . अनन्तानुबन्धीचतुष्कके अवक्तव्य संक्रामक, पुरुषवेदके अवस्थितसंक्रामक और स्त्रीवेदके भुजगार संक्रामक जीवोंने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। पुरुषवेदके भुजगारसंक्रामकोंने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और त्रसनालीके कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । इसी प्रकार मनुष्यत्रिकमें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि मिथ्यात्वके अल्पतर संक्रामक,पुरुषवेदके भुजगार संक्रामक तथा बारह कषाय और नौ नोकषायोंके प्रवक्तव्यसंक्रामक जीवोंने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च अपर्याप्त और मनुष्य अपर्याप्तकोंमें सत्ताईस प्रकृतियोंके सब पदोंके संक्रामकोंने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्रका और सब लोकका स्पर्शन किया है। इतनी विशेषता है कि स्त्रीवेद और पुरुषवेदके भुजगारसंक्रामकोंने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। ४६
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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