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________________ गा ५८ उत्तरपडिपदेससंकमे भुजगारो ३५६ असंखेजा । पुरिसवे० अवढि० असंखेजा । एवं तिरिक्खा । णवरि बारसक०-णवणोक० अवत्त०संका त्थि । ६५२६. आदेसेण णेरइय० सव्वपयडी० सव्यपद संका० केत्तिया ? असंखेजा । एवं सव्वणेरइय-सव्वपंचिं०-तिरिक्ख० मणुस-अपज०-देवगदिदेवा भवणादि जाव अवराजिदा ति । मणुसेसु णारयभंगो। णवरि सवपय० अवत्त० मिच्छत्त-सबपदसंका पुरिसवे० अवविदसंका० संखेजा । मणुसपज०.मणुसिणी० सव्वट्ठदेवा सव्वपय० सव्वपदसंका० केत्तिया ? संखेजा । एवं जाव० ।। ६५३०. खेत्ताणु० दुविहो णिद्द सो ओघेण आदेसेण य । ओघेण सवपदसंका० केव० खेत्ते ? लोगस्स असंखे० भागे । सोलसक०-भय-दुगुछ० अवत्त० लोग० असंखे० भागे। सेसपदसंका० सबलोगे । सत्तणोक०-अवत्त-पुरिसवे० अबढि० लोग० असंखे० भागे। सेसपदसंका० सव्वलोगे। एवं तिरिक्खा० । णवरि बारसक०.णवणोक० अवत्त० णत्थि । सेसगदीसु सव्वपयडी० सव्वपदसंका० लोगस्स असंखे० भागे । एवं जाव०। ६५३१. पोसणाणु० दुविहो णि० ओघे० आदेसे० । ओघेण मिच्छ० सवपदसं० लोग० असंखे० भागो, अट्ठचोइस० ( देसूणा )। सम्म०-सम्मामि० भुज०अप्प० पुरुषवेदके अवस्थितसंक्रामक जीव असंख्यात हैं। इसी प्रकार सामान्य तिर्यञ्चोंमें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि बारह कषाय और नौ नोकषायोंके अवक्तव्यसंक्रामक जीव नहीं हैं। ६५२६. आदेशसे नारकियोंमें सब प्रकृतियोंके सब पदोंके संक्रामक जीव कितने हैं ? असंख्यात हैं। इसी प्रकार सब नारकी. सब पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च, मनुष्य अपर्याप्त, देवगतिमें सामान्य देव और भवनवासियोंसे लेकर अपराजित विमान तकके देवोंमें जानना चाहिए। मनुष्योंमें नारकियोंके समान भङ्ग है। इतनी विशेषता है कि सब प्रकृतियोंके अवक्तव्यसंक्रामक जीव, मिथ्यात्वके सब पदोंके संक्रामक जीव और पुरुषवेदके अवस्थित संक्रामक जीव संख्यात हैं। मनुष्य पर्याप्त, मनुष्यिनी और सर्वार्थसिद्धिके देवोंमें सव प्रकृतियोंके सब पदोंके संक्रामक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं । इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा तक ले जाना चाहिए। 8१३०.क्षेत्रानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-श्रोध और आदेश। ओघसे दर्शनमोहनीयत्रिकके सब पदोंके संक्रामक जीवोंका कितना क्षेत्र है ? लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र है। सोलह कषाय, भय और जुगुप्साके अवक्तव्यसंक्रामकोंका लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र है। शेष पदोंके संक्रामकोंका सब लोक क्षेत्र है। सात नोकषायोंके अवक्तव्यसंक्रामकोंका और पुरुषवेदके अवस्थितसंक्रामकोंका लोकके असंख्यावें भाग प्रमाण क्षेत्र है। शेष पदोंके संक्रामकोंका सब लोक क्षेत्र है । इसी प्रकार सामान्य तिर्यञ्चोंमें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि बारह कषाय और नौ नोकषायोंके अवक्तव्यसंक्रामक नहीं हैं। शेष गतियोंमें सब प्रकृतियोंके सब पदोंके संक्रामकोका लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र है। इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा तक ले जाना चाहिए। ६५३१. स्पर्शनानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे मिथ्यात्वके सब पदोंके संक्रामकोंने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और त्रसनालीके कुछ कम आठ वटे
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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