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________________ गा०५८] उत्तरपयडिपदेससंकमे भजगारो ३४३ ॐ हस्स-रविभुजगारसंकामयंतर जइ इच्छासि, अरदि-सोगाणमेयसमय बंधावेदव्यो। ४८३. तं जहा-हस्सरदीओ बंधमाणो एयसमयमरेइ-सोगबंधगो जादो । तदो पुणो वि तदणंतरसमए हस्सरदीणं बंधगो जादो । एवं बंधिदूण बंधावलियवदिक्कमे बंधाणुसारेण संकामेमाणयस्स लद्धमेयसमयमेत्तभुजगारसंकामयंतरं ।। * जइ अप्पयरसंकामयंतरमिच्छसि हस्सरदोमो एयसमयं बंधावेयव्वाओ। ६.४८४. एदस्स णिदरिसणं-एदो अरदिसोगबंधगो एयसमयं हस्सरदिबंधगो जादो । तदर्णतरसमए पुणो वि परिणामपच्चएणारदिसोगाणं बंधो पारद्धो। एवं बंधिऊण बंधावलिया दिक्कमेदेणेवर कमेण संकामेमाणयस्स लद्धमेयसमयमेतं पयदजहण्णंतरं । एदेणेव णिदरिसणेणारदिसोगाणं पि भुजगारप्पयरसंकामयंतरमेयसमयमेत्तं । हस्स-रइ-विवजासेण जोजेयव्वं । इस्थि-णqसयवेदाणं वि भुजगारप्पयरजहण्णंतरमेवं चे साहेयव्वं विसेसाभावादो। * अवत्तव्वसंकामयंतर केवचिरं कालावो होदि ? ६४८५. सुगर्म । * हास्य और रतिके भुजगार संक्रामकका यदि अन्तर लाना इष्ट है तो अरति और शोकका बन्ध कराना चाहिए। ६४८३. यथा-हास्य और रतिका बन्ध करनेवाला जीव एक समयके लिए अरति और शोकका बन्ध करनेवाला हो गया। उसके बाद फिर भी उसके अनन्तर समयमें हास्य और रतिका बन्ध करनेवाला हो गया। इस प्रकार बन्ध करके बन्धावलिके व्यतीत होने पर बन्धके अनुसार संक्रम करनेवाले जीवके भुजगार संक्रमका एक समयप्रमाण अन्तरकाल प्राप्त हो जाता है। * यदि अल्पतर संक्रामकका अन्तरकाल लाना इष्ट है तो हास्य और रतिका एक समय तक बन्ध कराना चाहिए। ६४८४. इसका उदाहरण-अरति और शोकका बन्ध करनेवाला कोई एक जीव एक समय तक हास्य और रतिका बन्ध करनेवाला हो गया। उसके बाद अनन्तर समयमें उसने फिर भी परिणाम वश अरति और शोकका बन्ध प्रारम्भ किया। इस प्रकार बन्ध करके बन्धावलिके व्यतीत होनेके कारण क्रमसे संक्रम करनेवाले उसके प्रकृत जघन्य अन्तरकाल एक समयमात्र प्राप्त हो जाता है । इसी उदाहरणके अनुसार अरति और शोकके भी भुजगार और अल्पतर संक्रामकका जघन्य अन्तरकाल एक समय मात्र हास्य और रतिको अरति और शोकके स्थानमें रखकर लगा लेना चाहिए। स्त्रीवेद और नपुंसकवेदके भी भुजगार और अल्पतर संक्रामकका जघन्य अन्तर काल इसी प्रकार साध लेना चाहिए, क्योंकि पर्वोक्त कथनसे इस कथनमें कोई विशेषता नहीं है। * अवक्तव्य संक्रामकका अन्तरकाल कितना है ? ६४८५. यह सूत्र सुगम है।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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