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________________ ३४२ जयधवलास हिदे कसायपाहुडे * जहण्णेण अंतोमुहुत्तं । * उक्कस्सेण उवडपोग्गलपरियहं । ६४७८. दाणि सुत्ताणि सुगमाणि । * हस्स-रइ-अरह-सोगाणं कालादो होदि ? ४७६. सुगमं । भुजगारअप्पयरसंकामयंतं केवचिर * जहणणेण एयसमओ । ६ ४८०. कुदो १ भुजगारप्पदराणमण्णोष्णोणंतरिदाणं तदुवलंभादो । उक्कस्सेष अंतोमुडुत्तं । [ बंधगो ६ ४८१. पडिवक्खबंधगद्धाए सगबंधकालेण च जहाकममंतरिदाणं पयदभुजगारप्पयरसंकंमाणं तेत्तियमेत्तु कस्संतरसिद्धीए पडिबंधाभावादो । संपहि पुव्वुसुतणिद्दिट्ठेयसमयमेतजहांतरस्स फुडीकरणङ्कं सुतपबंधमुत्तरं भणइ । * कथं ताव हस्स-रदि-भरदिसोगाणमेयसमयमंतर ? ४८२. सुगममेदं सिस्सा हिप्पायासंकावयणं । * जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है । * उत्कृष्ट अन्तरकाल उपार्ध पुद्गल परिवर्तन प्रमाण है ! ६४७८. ये सूत्र सुगम हैं । * हास्य, रति, अरति और शोकके भुजगार और अल्पतर संक्रामकका अन्तरकाल कितना है ? ६४७६. यह सूत्र सुगम है । * जघन्य अन्तरकाल एक समय है 1 ४८०. क्योंकि एक दूसरेके द्वारा अन्तरको प्राप्त भुजगार और अल्पतर संक्रमोंका जघन्य अन्तर एक समय उपलब्ध होता है । * उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है । ४८१. क्योंकि प्रतिपक्ष प्रकृतियोंके बन्धक काल और अपने अपने बन्धककालके द्वारा यथाक्रम अन्तरको प्राप्त हुए प्रकृत भुजगार और अल्पतर संक्रमका अन्तर्मुहूर्त प्रमाण उत्कृष्ट अन्तर कालके सिद्ध होने में कोई रुकावट नहीं पाई जाती। अब पूर्वोक्त सूत्रमें निर्दिष्ट एक समयमात्र जघन्य अन्तरको स्पष्ट करनेके लिए आगेके सूत्र प्रबन्धको कहते हैं * हास्य, रति, अरति और शोकका एक समय अन्तरकाल कैसे है ? ६४८२. शिष्योंके अभिप्रायको प्रगट करनेवाला यह आशंका वचनं सुगम हैं।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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