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________________ गा० ५८ ] उत्तरपयडिपदेससंकमे भुजगारो ३३३ आदि कादूण सव्त्रजहण्णमिच्छत्तद्धमच्छिय सम्मत्तं घेत्तूण पुणो सव्वलहु मिच्छत्तं गदस्स पढमसमए लद्धमंतरं कायव्वं । * उकस्सेण उवडपोग्गलपरियहं । $ ४४०. तं कथं ? एको अणादियमिच्छाइट्ठी अद्धप्पोग्गलपरियट्टादिसमए सम्मत्तमुप्पाइय सव्वलहु परिणामपच्चएण मिच्छत्तमुवगओ तदो सम्मत्तस्सुव्वेल्लणावसेणप्पदरसंकर्म करेमाणो गच्छदि, जात्र सव्वजहण्णुव्वेल्लणकालेगुव्वेल्लेमाणयस्स दुचरिमट्ठिदिखंडयचरिमफालिति । तत्तोप्पहुडिपयदंतरपारंभं काढूण देसूणमद्धपोग्गलपरियट्टं परियट्टिदूण तदवसाणे अंतोमुहुत्तावसेसे संसारे सम्मत्तं पडिवण्णो संतो पुणो वि मिच्छत्ते पदिदो तस्स बिदियसमए अप्पयरसंकामयस्स लद्धमंतरं होइ । एवमवत्तव्त्रसंकामयस्स वित्त वर अद्धपोग्गलपरियट्टा दिसमए पढमसम्मत्तमुप्पाइय सव्वलहु मिच्छत्तं पडिवण्णस्स पढमसमए पयदसंकमस्सादि काढूण पुणो दीहंतरेण सम्मतमुप्पाइय मिच्छत्त मुवगयस्स पढमसमयम्मि लद्धमंतरं कायव्वं । * सम्मामिच्छत्तस्स भुजगार - अप्पयरसंकामयंतरं केवचिरं कालादो होदि ? समयमें वक्तव्य संक्रमका प्रारम्भ करके और सबसे जघन्य काल तक मिथ्यात्वमें रह कर तथा सम्यक्त्वको ग्रहण कर पुनः अतिशीघ्र मिथ्यात्वको प्राप्त होकर उसके प्रथम समयमें अवक्तव्य संक्रम करता है उसके अवक्तव्य संक्रमका भी अन्तरकाल प्राप्त करना चाहिए । * उत्कृष्ट अन्तरकाल उपार्थ पुद्गल परिवर्तन प्रमाण है । - वह कैसे ? १४४०. शंका समाधान - एक अनादि मिथ्यादृष्टि जीव अर्धपुद्गल परिवर्तनके प्रथम समय में सम्यक्त्व उत्पन्न करके अति शीघ्र परिणाम वश मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ । अनन्तर सम्यक्त्वक उद्वेलनाके कारण अल्पतर संक्रमको करता हुआ वह भी सबसे जघन्य उद्वेलना कालके द्वारा उद्वेलना करता हुआ द्विचरमस्थिति काण्डककी अन्तिम फालिके प्राप्त होने तक जाता है। इसके बाद वहाँ से लेकर प्रकृत संक्रमके अन्तरकालका प्रारम्भ करके तथा कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तन काल तक परिभ्रमण करके उसके अन्तमें संसारमें रहनेका अन्तर्मुहूर्त प्रमाण काल शेष रहने पर सम्यक्त्वको प्राप्त होकर पुनः मिथ्यात्वमें गया । उसके मिध्यात्वमें जाने के दूसरे समय में अल्पतर संक्रामकका उत्कृष्ट अन्तरकाल प्राप्त होता है। इसी प्रकार अवक्तव्य संक्रामकका भी अन्तर काल करना चाहिए । इतनी विशेषता है कि अर्धपुद्गल परिवर्तनके प्रथम समयमें प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करके और अतिशीघ्र मिथ्यात्वमें ले जाकर उसके प्रथम समयमें प्रकृत संक्रमका प्रारम्भ करावे । पुनः दीर्घ अन्तरकालके बाद सम्यक्त्वको उत्पन्न कराके और मिथ्यात्वमें ले जाकर उसके प्रथम समयमें प्रकृत संक्रमका अन्तरकाल प्राप्त कर लेना चाहिए । * सम्यग्मिथ्यात्वके भुजगार और अल्पतर संक्रामकका अन्तरकाल कितना है ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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