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________________ ३३४ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [बंधगो ६ ६४४१. सुगम । . जहएणण एयसमो । ६४४२. तं जहा–चरिमुवेल्लणकंडयम्मि भुजगारसंकमस्सादि कादूण तदणंतरसमए सम्मत्तमुप्पाइय अप्पयरभावेणेयसमयमंतरिय पुणो वि बिदियसमए गुणसंकमवसेण भुजगारसंकामगो जादो लद्धमंतरं। अप्पयरस्स बुञ्चदे-दुचरिमुव्वेलणकंडयचरिमफालीए अप्पयरसंकमं कुणमाणो चरिमुवेलणखंडयपढमफालिविसयगुणसंकमेणेयसमयमंतरिय पुणो वि सम्मत्तुप्पत्तिपढमसमए अप्पयरसंकामगो जादो लद्धमंतरं । * उकस्सेण उवड्डपोग्गलपरियढें । ६४४३. तं जहा-भुजगारसंकमस्स सम्मत्तभंगेण चरिमुव्बेल्लणकंडयम्मि आदि कादणंतरियस्स पुणो दीहतरेणसम्मत्ते समुप्पाइदे तदियसमयम्मि गुणसंकमवसेण लद्धमंतरं कायव्वं । अप्पयरसंकमस्स वि सम्मत-मंगेण पयदंतरपरूषणा कायया । णवरि दीहतरेण सम्मत्तं पडिवजिय गुणसंकमादो विज्झादे पदिदस्स लद्धमंतरं दट्ठवं । * अवत्तव्वसंकामयंतरं केवचिरकालादो होदि ? ६४४४. सुगमं । ६४४१. यह सूत्र सुगम है। * जघन्य अन्तरकाल एक समय है। ६४४२. यथा-अन्तिम उद्वेलना काण्डकमें भुजगारसंक्रमका प्रारम्भ करके उसके अनन्तर समयमें सम्यक्त्वको उत्पन्न कराके उस समय हुए अल्पतरसंक्रमके द्वारा एक समयका अन्तर देकर पुनः दूसरे समयमें गुणसंक्रम होनेके कारण भुजगारसंक्रामक हो गया। इस प्रकार भुजगार. संक्रामकका जघन्य अन्तर एक समय प्राप्त हो जाता है । अब अल्पतर संक्रमका अन्तर काल कहते हैं-द्विचरम उद्वेलना काण्डककी अन्तिम फालिमें अल्पतर संक्रमको करता हुआ अन्तिम उद्वेलना काण्डककी प्रथन फालिविषयक गुणसंक्रमके द्वारा उसका अन्तर करके पुनः सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके प्रथम समयमें अल्पतर संक्रामक हो गया। इस प्रकार अल्पेतर संक्रमका जघन्य अन्तर एक समय प्राप्त हुआ। * उत्कृष्ट अन्तरकाल उपाधं पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण है। ६४४३. यथा-सम्यक्त्व के समान इसके भुजगार संक्रमका अन्तिम उद्वेलना काण्डकमें प्रारम्भ करके तथा अनन्तर समयमें उसका अन्तर करके पुनः दीर्घ अन्तर देकर सम्यक्त्वके उत्पन्न कराने पर उसके तीसरे समयमें गुणसंक्रमके कारण भुजगार संक्रम कराके अन्तरकाल प्राप्त कर लेना चाहिए । तथा इसके अल्पतर संक्रमकी भी सम्यक्त्वके समान उत्कृष्ट अन्तरकालकी प्ररूपणा कर लेनी चाहिए । इतनी विशेषता है कि दीर्घ अन्तरके बाद सम्यक्त्वको प्राप्त कराके गुणसंक्रम होकर विध्यात संक्रमको प्राप्त हुए जीवके अन्तरकाल होता है ऐसा जानना चाहिए। * अवक्तव्य संक्रामकका अन्तरकाल कितना है ? ६४४४. यह सूत्र सुगम है।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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