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________________ ३३० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [बंधगो६ गुणसंकमपारंभेण पयदंतरपरिसमत्ती जादा लद्धो जहण्णेणंतोमुहुत्तमेत्तो पयदभुजगारं. तरकालो। * उकस्सेण उवढपोग्गलपरियहूँ । ६४३०. तं जहा?–एको अणादियमिच्छाइट्ठी पढमसम्मत्तं पडिवजिय गुणसंकमेण भुजगारसंकामगो जादो। तदो सबजहण्णगुणसंकमकाले बोलीणे अप्पयरसंकमेणंतरिय कमेण संकामगो होदूणद्धपोग्गलपरियट्ट देसूर्ण परिभमिय तदवसाणे अंतोमुहत्तसेसे उवसमसम्मत्तं घेत्तण गुणसंकमवसेण भुजगारसंकामगो जादो लद्धो आदिन्लं तिल्लेहिं दोहिं अंतोमुहुत्तेहिं परिहीणद्धपोग्गलपरियट्ठमेतो पयदुक्कस्संतरकालो। - ® एवमप्पदरावहिदसंकामयंतरं। ६४३१. जहा भुजगारसंकामयंतरं परूविदमेवमेदेसि पि पदाणं परूवेयव्वं विसेसा. भावादो। णवरि जहण्णेणंतोमुहुत्तपरूवणा अप्पदरसंकमस्स२ जहण्णमिच्छत्तकालेणं. तरिदस्स परूवेयया । अवट्ठिदसंकमस्स वि पुव्वुप्पण्णसम्मत्तेण मिच्छत्तादो सम्मत्त. मुवगयस्स पढमावलियाए चरिमसमए आदि कादूण पुणो सव्वजहण्णवेदयसम्मत्तकालसेसेण तप्पाओग्गजहण्णंतोमुहत्तपमाणमिच्छत्तकालेण चांतरिदस्स पुणो वेदयसम्मत्त कालकी समाप्ति हो गई। इस प्रकार प्रकृत भुजगार संक्रमका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त प्राप्त हो गया। * उत्कृष्ट अन्तर काल उपार्ध पुद्गल परिवर्तन प्रमाण है। . ६४३०. यथा-एक अनादि मिथ्यादृष्टि जीव प्रथम सम्यक्त्वको प्राप्त करके गुणसंक्रमके द्वारा भुजगार संक्रामक हो गया। उसके बाद सबसे जघन्य गुणसंक्रमके कालके व्यतीत होने पर उसका अल्पतर संक्रमके द्वारा अन्तर करके तथा क्रमसे असंक्रामक होकर कुछ कम अर्धपुद्गन परिवर्तन काल तक परिभ्रमण करके उसके अन्तमें अन्तमुहूर्त काल शेष रहने पर उपशमसम्यक्त्व को ग्रहण करके गुणसंक्रमके द्वारा भुजगार संक्रामक हो गया। इस प्रकार प्रकृत उत्कृष्ट अन्तरकाल आदि और अन्तके दो अन्तमुहूतोंसे हीन अर्धपुद्गल परिवर्तन प्रमाण प्राप्त हो गया। * इसी प्रकार अल्पतर और अवस्थित संक्रामकोंका अन्तर काल जानना चाहिए। ६४३१. जिस प्रकार भजगार मंक्रामकका अन्तर काल कहा है उसी प्रकार इन पदोंका भी अन्तर काल कहना चाहिए, क्योंकि कोई विशेषता नहीं है । अथवा इतनी विशेषता है कि मिथ्यात्वके अल्पतर संक्रामकका जघन्य अन्तरकाल अन्तम हत कहना चाहिए। तथा अवस्थित संक्रमका भी, पहले.उत्पन्न हए सम्यक्त्वमे मिश्यात्वमें जाकर पुनः सम्यक्त्वको प्राप्त हुए जीवके प्रथम प्रावलिके अन्तिम समयमें अवस्थित संक्रमको पन: शेष रहे सबसे जघन्य वेदकसम्यक्त्वके काल द्वारा तथा मिध्यात्वके तत्प्रायोग्य जघन्य अन्तर्मुहूर्त प्रमाण कालके द्वारा उसका अन्तर फिराके पुनः वेदका सम्यक्त्वको प्राप्त करके उसकी प्रथम श्रावलिके द्वितीय समयमें, अन्तर काल प्राप्त कर लेना चाहिए। १. कुदो । ता० । २. कालस्स त ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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