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________________ ___ २६१ गा०५८] उत्तरपयांडपदेससंकमे भुजगारो पादकैरभिलापैरनभिलाप्यत्वादिति प्रतिपत्तव्यम् । 8 एदेण अट्ठपदेण तत्थ समुकित्तणा। ६३०६. एदेणाणतरं णिद्दिद्वेण?पदेण भुजगारसंकमे परूवणिज्जे तेरसाणियोगद्दाराणि तत्थ णादव्बाणि भवंति समुक्त्तिणा जाव अप्पाबहुए ति । तत्थ ताव सामित्तादीणमणियोगद्दाराणं जोणीभूदा समुक्कितणा अहिकीरदि ति जाणाविदमेदेण सुत्तेण । तत्थ वि ओघादेसभेदेण दुविहणिद्देससंभवे ओघणिदेसं ताव कुणमाणो सुत्तपबंधमुत्तरं भणइ । मिच्छत्तस्स भुजगार-अप्पदर-अवडिद-अवत्तव्व-संकामया अत्थि। ६३१०. मिच्छत्तस्स पदेसग्गभेदेहि चउहि मि पयारेहि संकामेंता जीवा अत्थि ति समुक्कित्तिदं होदि । तत्थेदेसि पदाणं संभवविसयो इत्थमणुगंतव्यो । तं जहा--अट्ठावीससंतकम्मियमिच्छाइट्ठिणा वेदगसम्मत्ते पडिवण्णे पढमसमये मिच्छत्तस्स विज्झादेणावत्तव्यसंकमो होइ । पुणो विदियादिसमएसु भुजगारसंकमो अवविदसंकमो अप्पयरसंकमो वा होइ जाव आवलियसम्माइट्ठि ति । तत्तो उपरि सव्वत्थ वेदयसम्माइडिम्मि अप्पयरसंकमो जाव दंसणमोहक्खवणाए अपुचकरणं पविट्ठस्स गुणस्संकमपारंभो ति गुणसंकमविसए सम्वत्थेव भुजगारसंकमो दट्टयो। उवसमसम्मत्तं पडिवण्णस्स वि पढमसमए अवत्तव्यसंकमो विदियादिसमएसु भुजगारसंकमो जाव गुणसंकमचरिमसमयो ति । तदो विज्झादसंकमविसए सव्वत्थ अप्पयरसंकमो त्ति घेत्तव्यं । होनेसे है ऐसा यहाँ जान लेना चाहिए । * इस अर्थपदके अनुसार प्रकृतमें समुत्कीर्तना कहते हैं। ६३०६. 'एदेण' अर्थात् अनन्तर निर्दिष्ट किये गये अर्थपदके अनुसार भुजगार संक्रमकी प्ररूपणा करने पर उसके विषयमें समुत्कीतेनासे लेकर अल्पबहत्व तक ये तेरह अनयोगद्वार उनमेंसे सर्व प्रथम स्वामित्व आदि अनुयोगद्वारोंका योनिभूत समुत्कीर्तना अधिकृत है यह इस सूत्र द्वारा जताया गया है । उसमें भी ओघ और आदेशसे दो प्रकारका निर्देश सम्भव होने पर सर्व प्रथम ओघ निर्देशको करते हुए आगेके सूत्रप्रबन्धको कहते हैं। * मिथ्यात्वके भुजगार, अल्पतर, अवस्थित और अवक्तव्य संक्रामक जीव हैं। ६३१०. मिथ्यात्वके प्रदेशोंके इन चार प्रकारोंसे संक्रमण करनेवाले जीव हैं इस प्रकार इस सूत्र-द्वारा यह समुत्कीर्तना की गई है। उसमेंसे इन पदोंका सम्भव विषय यहाँ पर समझ लेना चाहिए। यथा-अट्ठाईस प्रकृतियोंकी सत्तावाले मिथ्यादृष्टि जीवके द्वारा वेदकसम्यक्त्वके प्राप्त होने पर प्रथम समयमें मिथ्यात्वका विध्यात संक्रमके द्वारा अवक्तव्य संक्रम होता है। पुनः द्वितीयादि समयोंमें भुजगार संक्रम, अवस्थित संक्रम या अल्पतर संक्रम होता है । जो सम्यग्दृष्टिके एक आवलिप्रमाण काल जाने तक होता है। उसके आगे सर्वत्र वेदकसम्यग्दृष्टिके दर्शनमोहनीयकी क्षपणामें अपूर्वकरणमें प्रविष्ट हुए जीवके गुण संक्रमके प्रारम्भ होने तक अल्पतर संक्रम होता है । गुणसंक्रमकी अवस्थामें सर्वत्र ही भुजगारसंक्रम जानना चाहिए। उपशमसम्यक्त्वको प्राप्त हुए जीवके भी प्रथम समयमें अवक्तव्यसंक्रम होता है और द्वितीयादि समयोंमें गुणसंक्रमके अन्तिम समय तक भुजगार संक्रम होता है । इसके बाद विध्यातसंक्रमके होने पर सर्वत्र अल्पतरसंक्रम ग्रहण करना चाहिए। पर ज्ञातव्य हैं
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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