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________________ २३० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे । बंधगो ६ १२१. अणुदिसादि सव्वट्ठा ति मिच्छ०-सम्मामि०-अणताणु०४ उक० अणुक्क० णत्थि अंतरं । बारसक०–णवणोक० उक्क० णत्थि अंतरं । अणुक्क० जहण्णु० एयस० । एवं जाव० । * एत्तो जहणणयं। ६ १२२. एत्तो उक्कस्संतर विहासणादो उवरि जहण्णयमंतरमिदाणिं विहासइस्सामो त्ति अहियारसंभालणवक्कमेदं । * कोहसंजलण-माणसंजलण-मायासंजलण-पुरिसवेदाणं जहण्णपदेससंकामयस्संतरं केवचिरं कालादो होदि ? ६१२३. सुगमं । विशेषार्थ-अपने अपने स्वामित्वको देखते हुए नारकियोंके समान देवोंमें भी सब प्रकृतियोंके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका अन्तरकाल नहीं बनता यह स्पष्ट ही है। तथा इनके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका जो अलग अलग जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल कहा है सो उसे जिस प्रकार हम नारकियोंमें घटित कर बतला आये हैं उसी प्रकार यहाँ पर भी घटित कर लेना चाहिए । मात्र यहाँ उत्कृष्ट अन्तर अपनी अपनी कुछ कम उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण ही कहना चाहिए। अन्य कोई विशेषता न होनेसे इसका अलगसे स्पष्टीकरण नहीं किया है। ६१२१. अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धितकके देवोंमें मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी चतुष्कके उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका अन्तरकाल नहीं है । बारह कषाय और नौ नोकषायोंके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका अन्तरकाल नहीं है। अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर एक समय है। इसी प्रकार अनाहारक मागेणा तक जानना चाहिए। विशेषार्थ—उक्त देवोंमें मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्वका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम भवके प्रथम समयमें प्राप्त होता है । तथा अनन्तानुबन्धीका वहाँ उत्पन्न होनेके अन्तमुहूर्त बाद विसंजोजनाके अन्तिम समयमें प्राप्त होता है, इसलिए इनके उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका अन्तर सम्भव नहीं होनेसे उसका निषेध किया है। तथा बारह कषाय और नौ नोकषायोंका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम भी वहाँ उत्पन्न होनेके अन्तर्मुहूर्त बाद अपने स्वामित्वके अनुसार होता है, इसलिए वहाँ इनके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका अन्तर सम्भव न होनेसे उसका तो निषेध किया है और अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका एक समय अन्तर प्राप्त होनेसे जघन्य और उत्कृष्ट दोनों प्रकारका वह एक समय कहा है। इस प्रकार उत्कृष्ट अन्तरकाल समाप्त हुआ। * इससे आगे जघन्य अन्तरकालका व्याख्यान करते हैं। ६ १२२. इससे अर्थात् उत्कृष्ट अन्तरकालके व्याख्यानके बाद अब जघन्य अन्तरकालका व्याख्यान करते हैं इस प्रकार यह सूत्रवचन अधिकारकी सम्हाल करता है। * क्रोधसंज्वलन, मानसंज्वलन, मायासंज्वलन और पुरुषवेदके जघन्य प्रदेशसंक्रामकका जघन्य अन्तरकाल कितना है । ६ १२३. यह सूत्र सुगम है।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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