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________________ गा० ५८] उत्तरपयडिदेससंकमे एयजीवेण अंतरं २२७ ६११६. तिरिक्खेसु मिच्छ०-सम्मामि०-सम्म० उक्क०णत्थि अंतरं । अणु० जह० एगस०, सम्म० अंतोमु०, उक्क० उबड्डपोग्गलपरियट्ट। अणताणु०४ उक्क० णत्थि अंतरं । अणु० जह० अंतोमु०, उक्क० तिण्णि पलिदो० देसूणाणि । बारसक०–णवणोक० उक्क० णत्थि अंतर । अणुक्क० जहण्णु० एयसमओ। अन्तरकालका खुलासा इस प्रकार है-यहाँ पर मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्वका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम एक समयके लिए होता है इसलिए तो इनके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका जघन्य अन्तर एक समय कहा है । तथा प्रारम्भमें और अन्तमें सम्यक्त्वमें रखकर मध्यमें कुछ कम तेतीस सागरकाल तक मिथ्यात्वमें रखनेसे मिथ्यात्वके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर प्राप्त होनेसे वह-तत्प्रमाण कहा है। तथा प्रारम्भमें और अन्तमें सम्यग्मिथ्यात्वका संक्रमण करावे और मध्यमें उद्वेलना द्वारा उसका अभाव हो जानेसे कुछ कम तेतीस सागरकाल तक उसकी सत्ताके बिना रखे । इस प्रकार सम्यग्मिथ्यात्वके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर प्राप्त होनेसे वह उक्त प्रमाण कहा है। सम्यक्त्वके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए। मात्र यह अन्तर मध्यमें कुछ कम तेतीस सागरकाल तक सम्यक्त्वके साथ रखकर प्राप्त करना चाहिए। सम्यक्त्वके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त कहनेका कारण यह है कि इसका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम ऐसे जीवके होता है जो सम्यक्त्वसेच्यत होकर मिथ्यात्वके प्रथम समयमें स्थित है। यहाँ जो सम्यक्त्वका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है वही इसके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका जघन्य अन्तरकाल जानना चाहिए। बारह कषाय और नौ नोकषायोंके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका काल एक समय है वही यहाँ इनके अनुत्कुष्ट प्रदेशसंक्रमका अन्तरकाल होता है, इसलिए यहाँ उक्त प्रकृतियोंके अनुत्कृष्ट प्रदेश संक्रमका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल एक समय कहा है । यह सामान्यसे नारकियोंमें अन्तरकालका विचार है। प्रत्येक पृथिवीमें यह अन्तरकाल इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए। मात्र जहाँ पर कुछ कम तेतीस सागर कहा है वहाँ पर वह कुछ कम अपनी-अपनी उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण कहना चाहिए। ६ ११६. तिर्यश्चों में मिश्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका अन्तरकाल नहीं है । अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका जघन्य अन्तर एक समय है, सम्यक्त्वका अन्तमु हूर्त है और सबका उत्कृष्ट अन्तर उवार्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण है। अनन्तानुबन्धीचतुष्कके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका अन्तरकाल नहीं है । अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका जघन्य अन्तर अन्तरमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्त कुछ कम तीन पल्य है । बारह कषाय और नौ नोकषायोंके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका अन्तरकाल नहीं है। अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर एक समय है। विशेषार्थ—यहाँ पर अन्य सब अन्तरकाल नारकियोंके समान घटित कर लेना चाहिए। केवल मिथ्यात्व आदि तीन प्रकृतियोंके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका उत्कृष्ट अन्तर उपार्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण कहनेका कारण यह है कि तिर्यश्च पर्यायमें कोई भी जीव इतने काल तक रहकर प्रारम्भमें और अन्तमें इनका संक्रम करे और मध्यमें न करे यह सम्भव है, इसलिए तो इनके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है, तथा अनन्तानुबन्धीचतुष्कका ऐसा तिर्यञ्च ही असंक्रामक हो सकता है जिसने इनकी विसंयोजना की है और यह काल कुछ कम तीन पल्य ही हो सकता है, इसलिए तियञ्चोंमें इनके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। शेष कथन सुगम है ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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