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________________ गा०५८] उत्तरपडिपदेससंकमे एयजीवेण कालो २१७ जहण्णविदी समय॒णा, उक्क. उकस्सद्विदी। सोलसक०'-णवणोक० उक्क० पदे०संका० जहण्णक० एयस० । अणु० जह० अंतोमु०, उक्क० उकस्सहिदी । एवं जाव० । ६१००. जहण्णए पयदं । दुविहो णि०-ओघे० आदेसे० । ओघेण मिच्छ० जह० पदे०संका० जहण्णुक्क० एयसमओ। अजह० जह• अंतोमु०, उक्क० छावहिसागरो० सादिरेयाणि । सम्म० जह० पदे०संका० जहण्णक० एयस० । अज० जह• एयस०,उक० पलिदो० असंखे०भागो । सम्मामि० जह० पदे०संका० जहण्णु० एयस० । अजह० जह. अंतोमु०, उक्क० वेछावद्विसागरो० सादिरेयाणि । सोलसक०-णवणोक० उकस्सभंगो। और सम्यग्मिथ्यात्वके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है। अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका जघन्य काल एक समयकम जघन्य स्थितिप्रमाण है और उत्कृष्ट काल उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण है । सोलह कषाय और नौ नोकषायोंके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है । अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका जघन्य काल अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट काल उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण है । इस प्रकार अनाहारकमार्गणा तक जानना चाहिए। विशेषार्थ देवोंमें सन्यक्त्वके जघन्य और उत्कृष्ट कालको ध्यानमें रखकर यहाँ पर मिथ्यात्वके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट काल तेंतीस सागर कहा है। यह काल वारह कषाय और नौ नोकषायोंका भी वन जाता है, इसलिए उसे मिथ्यात्वके समान जाननेकी सूचना की है। इसी प्रकार सम्यग्मिध्यात्व और अनन्तानुबन्धीचतुष्कके विषयमें भी जानना चाहिए । मात्र इनके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका जघन्य काल एक समय नारकियोंके समान वन जानेसे यह एक समय कहा है। सम्यक्त्वका भङ्ग नारकियोंके समान है यह स्पष्ट ही है। भवनवासी आदि नौ वेयक तकके देवोंमें अन्य सब काल इसी प्रकार बन जाता है। मात्र तेतीस सागरके स्थानमें अपनी अपनी स्थिति कहनी चाहिए। तथा भवनत्रिकमें मिथ्यात्वके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका उत्कृष्ट काल कहते समय वह कुछ कम अपनी अपनी उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण कहना चाहिए, क्योंकि इन देवोंमें सम्यग्दृष्टि जीव मरकर उत्पन्न नहीं होते, अतएव वहाँ भवके प्रथम समयसे सम्यग्दर्शन सम्भव नहीं होनेसे मिथ्यात्वका सम्यक्त्व प्राप्तिके पूर्व संक्रम नहीं बन सकता। अनुदिश आदिमें सब जीव सम्यग्दृष्टि ही होते हैं, अतएव उनमें सम्यक्त्वका प्रदेशसंक्रम सम्भव नहीं होनेसे उसका निर्देश नहीं किया। मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्वके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका जघन्य काल एक समय कम जघन्य स्थितिप्रमाण कहनेका कारण उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमके एक समयको कम करना है। शेष कथन सुगम है। १००. जघन्यका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे मिथ्यात्वके जघन्य प्रदेशसंक्रामकका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है। अजघन्य प्रदेशसंक्रामकका जघन्य काल अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट काल साधिक छयासठ सागर है । सम्यक्त्वके जघन्य प्रदेशसंक्रामकका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है। अजघन्ध प्रदेशसंक्रामकका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण है। सम्यग्मिथ्यात्वके जघन्य प्रदेशसंक्रामकका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है। अंजघन्य प्रदेशसंक्रामकका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल साधिक दो छयासठ सागरप्रमाण है। सोलह कषाय और नौ नोकषायोंका भङ्ग उत्कृष्टके समान है। विशेषार्थ-सब प्रकृतियोंका अपने-अपने जघन्य स्वामित्वके समय जघन्य प्रदेशसंक्रम १ ता०प्रतौ उक्कस्सहिदी...सोलसक० इति पाठः । २८
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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