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________________ २१३ गा०५८] उत्तरपयडिपदेससंकमे एयजीवेण कालो ६५. आदेसेण णेरइय० मिच्छ० उक्क० पदे०संका० जहण्णक० एयस० । अणु० जह० अंतोमु०, उक्क० तेतीसं सागरो० देसूणाणि । सम्म० उक० पदे०संका० जहण्णुक्क० एयसमओ । अणु० जह० एयस०,उक्क० पलिदो० असंखे०भागो। सम्मामि०-अणंताणु०४ उक० पदे०संका० जहण्णु० एयस० । अणु० जह० एयस०, उक्क० तेतीसं सागरोत्रमं । विशेषार्थ-स्वामित्वके अनुसार सब कर्मों का उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम एक समयके लिए होता है, इसलिए सर्वत्र इसका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय कहा है। मात्र सब कर्मो के अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमके कालमें फरक है जिसका खुलासा इस प्रकार है-मिथ्यात्वका प्रदेशसंक्रम मात्र सम्यग्दृष्टिके होता है और २८ प्रकृतियोंकी सत्तावाले सम्यग्दृष्टिका जघन्य काल अन्तमुहूर्त और उत्कृष्ट काल साधिक छयासठ सागर है, इसलिए इसके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका जघन्य काल अन्तमुहूर्त और उत्कृष्ट काल साधिक छयासठ सागर कहा है । सम्यक्त्वका प्रदेशसंक्रम मिथ्यात्व गुणस्थानमें होता है । यतः मिथ्यात्वका जघन्य काल अन्तमुहर्त है और मिथ्यात्वमें रहते हुए सम्यक्त्वका अधिकसे अधिक सत्त्व पल्यके असंख्यातवें मागप्रमाण काल तक रहता है, इसलिए इसके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका जघन्य काल अन्तमुहुर्त और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण कहा है । सम्यग्मिथ्यात्वका प्रदेशसंक्रम मिथ्यात्व गुणस्थानमें भी होता है और उसकी सत्तावाले सम्यग्दृष्टिके भी होता है । इन गुणस्थानोंमें कमसे कम रहनेका काल अन्तमुहूते है यह तो स्पष्ट ही है । साथ ही यदि काई जीव मध्यमें वेदक काल तक मिथ्यात्वमें रहकर मिथ्यात्वमें रहने के पहले और बादमें कुल मिलाकर दो छयासठ सागर काल तक वेदक सम्यक्त्वके साथ रहे । तथा वहाँसे आकर पुनः मिथ्यात्वमें सम्यग्मिथ्यात्वके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमके काल तक रहता हुआ उसका संक्रम करे तो यह सम्भव है। साथ ही सम्यक्त्वके साथ प्रथम छयासठ सागर कालमें प्रवेश करनेके पूर्व भी वह सम्यग्मिथ्यात्वकी सत्तावाला होकर अपने संक्रमके उत्कृष्ट काल तक उसका संक्रम करे तो यह भी सम्भव है । इन्हीं सब बातोंका विचार कर यहाँ पर सम्यग्मिथ्यात्वके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट काल साधिक दो छयासठ सागर कहा है। सोलह कषाय और नौ नोकषायोंका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम क्षपणाके समय होता है। इसके पहले इनका अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है, इसलिए भव्योंकी अपेक्षा तो यह अनादि-सान्त और सादि-सान्त है। किन्तु अभव्योंके सदाकाल होनेके कारण अनादि-अनन्त है । सादि-सान्त विकल्प उन भन्योंके होता है जो उपशमणि पर आरोहण कर चुके हैं और ऐसे जीव या तो अन्तर्मुहूर्तमें क्षपकनेणि पर आरोहण कर अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका अन्त कर देते हैं या उपार्ध पुद्गलपरिवर्तन काल तक उसके साथ रहते हैं, इसलिए यहाँ पर उक्त प्रकृतियोंके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट काल उपाधं पुदगलपरिवर्तनप्रमाण कहा है। ६५. आदेशसे नारकियोंमें मिथ्यात्वके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है । अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका जघन्य काल अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट काल कुछ कम तेतीस सागर है । सम्यक्त्वके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है। अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण है। सम्यग्मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धीचतुष्कके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है । अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल तेतीस
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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