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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [बंधगो ६ बारसक०-णवणोक० उक्क० पदे०संका० जहण्णक० एयस० । अणु० जह० अंतोमुहत्तं, उक्क० तेत्तीसं सागरोवमं० । एवं सवणेरइय० । णवरि सगढिदी। णवरि सत्तमाए अणंताणु०४ अणु० जह० अंतोमु० । ६६६. तिरिक्खेसु मिच्छ० उक्क० पदे०संका० जहण्णु० एयस० । अणु० जह. अंतोमु०, उक्क० तिण्णि पलिदो० देसूणाणि । सम्म० णारयभंगो । सम्मामि० उक्क० सागर है । बारह कषाय और नौ नोकषायोंके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है । अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका जघन्य काल अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट काल तेतीस सागर है। इसी प्रकार सब नारकियोंमें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि अपनी अपनी आयुस्थिति कहनी चाहिए। तथा इतनी और विशेषता है कि सातवीं पृथिवीमें अनन्तानुबन्धीचतुष्कके अनत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका जघन्य काल अन्तमहत है। विशेषार्थ—सामान्यसे और प्रत्येक पृथिवीकी अपेक्षा सब नारकियोंमें सब प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम अपने स्वामित्व कालमें एक समयके लिए ही होता है इसलिए इसका सर्वत्र जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय कहा है। किसी नारकीका सम्यग्दृष्टि होकर कम से कम अन्तमुहूर्त तक और अधिक से अधिक कुछ कम तेतीस सागर तक मिथ्यात्वका अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमके साथ रहना सम्भव है, इसलिए यहाँ पर मिथ्यात्वके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका जघन्य काल अन्तमुहूर्त और उत्कृष्ट काल कुछ कम तेतीस सागर कहा है। यह सम्भव है कि कोई एक जीव सम्यक्त्वकी उद्वेलना करते हुए उसके संक्रममें एक समय शेष रहने पर नरकमें उत्पन्न हो और यह भी सम्भव है कि अन्य कोई जीव नरकमें उद्वेलनाके उत्कृष्ट काल तक वहाँ रहकर उसका संक्रम करे, इसलिए सम्यक्त्वके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण कहा है। सम्यग्मिथ्यात्वके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका जघन्य काल एक समय इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए । मात्र उत्कृष्ट काल तेतीस सागर प्राप्त करनेके लिए अधिकतर समय तक वेदकसम्यक्त्वके साथ रखकर प्रारम्भमें और अन्तमें मिथ्यात्वमें रखकर उसका संक्रम कराके प्राप्त करना चाहिए । सोलह कषायों और नौ नोकषायोंके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका उत्कृष्ट काल तेतीस सागर है यह तो स्पष्ट ही है । जघन्य कालका खुलासा इस प्रकार है-कोई एक अनन्तानुबन्धीचतुष्कका विसंयोजक जीव सासादनमें जाकर और अनन्तानुबन्धीका एक समय तक संक्रामक होकर अन्य गतिमें चला जाय यह सम्भव है. इसलिए इसके अनत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमक जघन्य काल एक समय कहा है । बारह कषाय और नौ नोकषायोंका जिस नारकीके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है वह उसके बाद कमसे कम अन्तमुहूर्त काल तक नरकमें अवश्य रहता है, इसलिए इनके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका जघन्य काल अन्तमुहूर्त कहा है । यह जघन्य और उत्कृष्ट काल सब नरकोंमें भी बन जाता है, इसलिए उनमें सामान्य नारकियोंके समान जाननेकी सूचना की है। मात्र प्रत्येक नरककी अलग अलग आयुस्थिति होनेसे उसका निर्देश अलगसे किया है। यहाँ इतना विशेष जान लेना चाहिए कि सातवें नरकमें सम्यग्दृष्टि नारकी मिथ्यात्वमें जाकर अन्तमुहूर्त काल व्यतीत हुए बिना मरणको नहीं प्राप्त होता, इसलिए वहाँ अनन्तानुबन्धीचतुष्कके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका जघन्य काल अन्तमुहूर्त कहा है। ६६६. तियेच्चोंमें मिथ्यात्वके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है । अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका जघन्य काल अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट काल कुछ कम तीन पल्य है।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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