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________________ २०६ . जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [बंधगो ६ ॐ लोहसंजलणस्स जहणणो पदेससंकमो कस्स ? ६८१. खविद-गुणिदकम्मंसियादिविसेसावेक्खमेदं पुच्छासुत्तं । * एइदियकम्मेण जहएणएण तसेसु आगदो, संजमासंजमं संजमं च बहुसो लडूण कसाएसु किं पि णो उवसामंदि। दोहं संजमडमणुपालिदूण खवणाए अब्भुढिदो तस्स अपुवकरणस्स श्रावलियपविट्ठस्स लोहसंजलणस्स जहएणो पदेससंकमो। ८२. एत्थेइदियकम्मेण जहण्णएण तसेसु आगमणे बहुसो संजमादिपडिलंभे च कारणं पुवं परूविदमेव । संपहि सइपि कसाए णो उवसामेदि चि ऐत्थ कारणं वुन्चदेजइ चारित्तमोहोवसामयगुणसेढिणिज्जराणुपालणट्ठमेसो सेढिमारुहिजदे. तो तत्थाबज्झमाणपयडीहितो गुणसंकमेण पडिच्छिजमाणदव्वं गुणसेढिणिजरादो समयं पड़ि असंखेजगुणमत्थि । एवं संते लोहसंजलणस्स तत्थुवचओ चेवे त्ति । एदेण कारणेण कसाएसु कि पि णो उवसामेदि ति वुत्तं । तदो सेसगुणसेढिणिज्जराओ जहावुत्तेण कमेणाणुपालिय पुणो अंतोमुहुत्तसेसे सिज्झिदव्यए ति कसायक्खवणाए उवढिदो तस्स अधापवत्तकरणं वोलाविय अपुवकरणे आवलियपविट्ठस्स अधापवत्तसंकमेण लोहसंजलणजहण्णसामित्तं होइ ति एसो सुत्तत्थसब्भावो। ___ * लोभसंज्वलनका जघन्य प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? ६८१. क्षपितकमांशिक और गुणितकमांशिक आदिरूप विशेषताकी अपेक्षा करनेवाला यह पृच्छासूत्र है। ___* जोएकेन्द्रियसम्बन्धी जघन्य सत्कर्मके साथ त्रसोंमें आकर तथा संयमासंयम और संयमको बहुत बार प्राप्तकर कषायोंका एक बार भी उपशम नहीं करता है। मात्र दीर्घकाल तक संयमका पालमकर क्षपणाके लिये उद्मत हुआ है उसके अपूर्वकरणमें प्रविष्ट होनेके आवलिके अन्तिम समयमें लोभसंज्वलनका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है । ८२. यहाँ पर एकेन्द्रियसम्बन्धी जघन्य सत्कर्मके साथ त्रसोंमें आनेका और अनेकबार संयम आदि प्राप्त करनेका कारण पहले अनेक बार कह ही आये हैं । तत्काल एकबार भी कषायोंका उपशम नहीं करता है' यह जो सूत्रवचन कहा है सो इसके कारणका निर्देश करते हैं-यदि चारित्रमोहके उपशामकसम्बन्धी गुणश्रेणिनिर्जराके पालन करनेके लिए यह जीव श्रेणिपर आरोहण करता है तो वहीं पर नहीं बँधनेवाली प्रकृतियोंमेंसे गुणसंक्रमके द्वारा संक्रमित होनेवाला द्रव्य गुणश्रेणिनिर्जराकी अपेक्षा प्रत्येक समयमें असंख्यातगणा होता है और ऐसा होने पर लोभसंज्वलनका वहाँ पर उपचय ही होगा। इस कारणसे वह कषायोंका एक बार भी उपशम नहीं करता है ऐसा कहा है, इसलिए शेष गुणश्रेणिनिर्जराओंका यथोक्त क्रमसे पालनकर पुन सिद्ध होनेके लिए अन्तर्मुहूर्त शेष रहने पर जो कषायोंकी क्षपणाके लिए उद्यत हुआ उसके अधःप्रवृत्तकरणको बिताकर अपूर्वकरणमें एक आवलिकाल प्रविष्ट होने पर उसके अन्तिम समयमें अधःप्रवृत्तसंक्रमके द्वारा लोभसंज्वलनका जघन्य स्वामित्व होता है यह इस सूत्रका अर्थ है।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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