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________________ २०४ जयधवलासहिदे कसा पाहुडे [ बंधगो ६ irat fair तत्थ बहुत्तोवलंभादो । एवमुवसामयसमयपवद्धे गालिय तदो तसेसु आगदो, सव्वलहुं संजमं लद्धो । पुणो कसायक्खवणाए उबट्ठिदो ति । एतदुक्तं भवति - मणुसेसु पन्जिय गब्भादिअवस्साणमुवरि सम्मत्तं संजमं च जुगवं पडिवज्जिय देसूणपुव्वकोडिमेत्तकालं गुणसेढिणिज्जरमणुपालिय पच्छा अंतोमुहुत्त सेसे सिज्झिदव्त्रए कदासेसपरिकरो कसायक्खवणाए अन्भुट्ठिदो ति । एवमवदिस्स तस्स अधापवत्तकरणचरिमसमए बिज्झादसंकमेण अटुकसायाणं जहणओ पदेससंक्रमो होइ ति सामित्तसंबंध । एत्थुवसंहारपरूवणा सुगमा । एवमेदं सामित्तमुवसंहरिय एदेण सरिससामित्तालावाणमरदि- सोगाणमप्पणं कुणमाणो सुत्तमुत्तरं भण्णइ एवमरइ- सोगाणं $ ७६. सुगममेदमप्पणासुत्तं । - * हस्स-रह-भय-दुर्गुद्वाणं पि एवं चेव । एवरि अपुव्वकरणस्सावलियपविट्ठस्स । § ७७. हस्स-रइ-भय-दुगु छाणमेवं चेत्र खविदकम्मंसियलक्खणेणागंतूण खवणाए सजणसामित्तं होइ । विसेसो दु अधापवत्तकरणं वोलिय अपुव्त्रकरणं पविट्ठस्स अर्थ विघटित हो जाता है सो ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि वहाँ पर बन्धकी अपेक्षा बहुत निर्जरा उपलब्ध होती है । इस प्रकार उपशामकसम्बन्धी समयप्रबद्धोंको गलाकर अनन्तर सोंमें आया और अतिशीघ्र संयमको प्राप्त हुआ । पुनः कषायोंकी क्षपणाके लिए उद्यत हुआ । कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्यमें उत्पन्न होकर गर्भसे लेकर आठ वर्षके बाद सम्यक्त्व और संयमको युगपत् प्राप्त होकर कुछ कम एक पूर्वकोटि काल तक गुणश्रेणिनिर्जराका पालनकर पश्चात् सिद्ध होने के लिए काल शेष रहने पर पूरी तैयारीके साथ कषायोंकी क्षपणाके लिए उद्यत हुआ । इस प्रकार अवस्थित हुए उसके अधःप्रवृत्तकरण के अन्तिम समय में विध्यातसंक्रमके द्वारा आठ कषायका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है ऐसा यहाँ स्वामित्वका सम्बन्ध करना चाहिए। यहाँ पर उपसंहारकी प्ररूपणा सुगम है । इस प्रकार इस स्वामित्वका उपसंहार करके इसके स्वामित्व के सदृश कथनवाले अरति और शोककी मुख्यता करते हुए आगेका सूत्र कहते हैं * इसी प्रकार अरति और शोका जघन्य स्वामित्व जानना चाहिए । है ६ ७६. यह अर्पणा सूत्र सुगम * हास्य, रति, भय और जुगुप्साका भी जघन्य स्वामित्व इसी प्रकार जानना चाहिए | इतनी विशेषता है कि इन कर्मो का जघन्य स्वामित्व जिसे अपूर्णकरणमें प्रविष्ट हुए एक आवलि हुआ है उसके होता है । § ७७. हास्य, रति, भय और जुगुप्साका इसी प्रकार क्षपितकर्मशिकविधिसे आकर क्षपणा के लिए उद्यत हुए जीवके जघन्य स्वामित्व होता है । विशेषता इतनी है कि अध:करणको बिताकर पूर्वकरणमें प्रविष्ट हुए जीवके प्रथम आवलिके अन्तिम समयमें अधः प्रवृत्तसंक्रमके द्वारा यह
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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