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________________ गा०५८] उत्तरपयडिअणुभागसंकमे हाणाणि १५७ बंधममुप्पत्तियसंकमाणाणि हदसमुप्पत्तियसंकमट्ठाणाणि हदहदसमुप्पत्तियसंकमट्ठाणाणि च । णवरि सम्मत्त-सम्मामिच्छताणं णस्थि बंधसमुप्पत्तियसंकमट्ठाणाणि । एवं सुगमत्तादो समुकित्तणामुल्लंथिऊण परूवणं पमाणं च एकदो भण्णमाणो सुत्तपबंधमुत्तरमाढवेदि ॐ उकस्सए अणुभागबंधहाणे एगं संतकम्मं तमेगं संकमट्ठाणं । ६ ५७५. उक्कस्सए अणुभागबंधट्ठाणे एयं संतकम्ममेगो संतकम्मवियप्पो ति वुत्तं होइ, बंधाणंतरसमए बंधट्ठाणस्सेव संतकम्मववएससिद्धीदो। तमेव संकमट्ठाणं षि, बंधावलियवदिक्कमाणंतरं तस्सेव संकमट्ठाणभावेण परिणयत्तादो। तदो पञ्जवसाणबंधट्ठाणस्स संतकम्मट्ठाणताणुवादमुहेण संकमट्ठाणभावविहाणमेदेण सुनेण कयं ति दट्ठव्वं । * दुचरिमे अणुभागबंधठाणे एवमेव । ६ ५७६. दुचरिमाणुभागबंधट्ठाणं णाम चरिमाणुभागबंधट्ठाणस्स . अणंतरहेट्ठिमबंधट्ठाणं तत्थ एवं चेव संतकम्मट्ठाण-संकमट्ठाणभावपरूवणा कायवा, अणंतरपरूविदण्णाएण तदुभयववएससिद्धीए पडिबंधाभावादो। एवं तिचरिमादिबंथट्ठाणेसु वि तदुभयभावसंभवो णेदव्यो ति परूवणट्ठमुत्तरसुत्तावयारो * एवं ताव जाव पच्छाणुपुव्वीए पढममपंतगुणहीणबंधट्ठाणमपत्तो त्ति । सब कर्मों के बन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान, हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान और हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान होते हैं। इतनी विशेषता है कि सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके बन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान । होते । इस प्रकार सुगम होनेसे समुत्कीर्तनाको उल्लंघन कर प्ररूपणा और प्रमाणका एक साथ कथन करते हुए आगेके सूत्रप्रबन्धको आरम्भ करते हैं * उत्कृष्ट अनुभागवन्धस्थानमें एक सत्कर्म होता है । वह एक संक्रमस्थान है। ६५७५. उत्कृष्ट अनुभागवन्धस्थानमें एक सत्कर्म अर्थात् एक सत्कर्मविकल्प होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है, क्योंकि बन्धके अनन्तर समयमें बन्धस्थानको ही सत्कर्म संज्ञाकी सिद्धि है । तथा वही संक्रमस्थान भी है, क्योंकि बन्धावलिके व्यतीत होनेके बाद वही संक्रमस्थानरूपसे परिणत हो जाता है । इसलिए इस सूत्रके द्वारा अन्तिम बन्धस्थानका सत्कर्मस्थानके अनुवादकी मुख्यतासे संक्रमस्थानभावका विधान किया ऐसा जानना चाहिए। * द्विचरम अनुभागबन्धस्थानमें इसी प्रकार जानना चाहिए। ६५७६. अन्तिम अनुभागबन्धस्थानके अनन्तर अधस्तन बन्धस्थानको द्विचरम अनुभागबन्धस्थान कहते हैं । वहाँ पर इसीप्रकार सत्कर्मस्थान और संक्रमस्थानभावका कथन करना चाहिए, क्योंकि अनन्तर कहे गये न्यायके अनुसार उक्त दोनों संज्ञाओंकी सिद्धिमें कोई प्रतिबन्ध नहीं है। इसी प्रकार त्रिचरम आदि बन्घस्थानोंमें भी उक्त दोनों भावोंका सम्भव जान लेना चाहिए इस प्रकारका कथन करनेके लिए आगेके सूत्रका अवतार किया है * इस प्रकार पश्चादानुपूर्वीसे जब तक प्रथम अनन्तगुणहीन बन्धस्थान नहीं प्राप्त होता तब तक जानना चाहिए।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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