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________________ १५६ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ बंधगो ६ * एन्तो द्वाणाणि कायव्वाणि । ९ ५७२. सणादिचवीसाणिओगद्दाराणं सभुजगार - पदणिक्खेव वड्डीर्ण समत्ति - समणंतरमेत्तो संकमद्वाणपरूवणा कायन्त्रा ति पहण्णावकमेदं । किमट्टमेसा द्वाणपरूवणा आगया? वीए पविछाड्डि-हाणीणभणतरवियप्पपदुप्पायणमा गया ? ण, वडिपरूवणाए चैत्र यत्तादो णिरत्थयमिदं, तत्थापरू विदबंधसमुप्पत्तिय-हदसमुप्पत्तिय-हदहद समुप्पत्तियभेदाणं पादेकमसंखेज लोग मेत्तछाणसरूवाणमिह परूवणोवलंभादो । जहा संतकम्मट्ठाणाणि तहा संकमट्ठाणाणि । ६५७३. जहा संतकम्मट्ठाणाणि बंधसमुप्पत्तिया दिभेयभिण्णाणि अणुभागविहत्तीए सवित्रं परुवाणि तहा संकमद्वाणाणि वि एत्थाणुगंतव्त्राणि, दव्त्रट्ठियणयावलंबणेण तत्तो देसि विसेसाभावादो त भणिदं होदि । * तहा वि परूवणा कायव्वा । § ५७४. तथापि पर्यायार्थिकनयानुग्रहार्थं तेषामिह पुनः प्ररूपणा कर्तव्यैवेत्यर्थः । संपहि तेसु परूविजमाणे तत्थ संकमट्ठाणपरूवणदाए इमाणि चत्तारि अणियोगद्दाराणि भवंति — समुत्तिणा परूवणा पमाणमप्यावहुअं च । तत्थ समुत्तिणा - सव्वेसिं कम्माणमत्थि * अब इससे आगे अनुभागसंक्रमस्थानोंका कथन करना चाहिए । ६ ५७२. भुजगार, पदनिक्षेप और वृद्धिके साथ संज्ञा आदि चौबीस अनुयोगद्वारोंका कथन समाप्त होनेके बाद आगे संक्रमस्थानोंका कथन करना चाहिए इस प्रकार यह प्रतिज्ञासूत्र है । शंका- यह स्थानप्ररूपणा किसलिए आई है ? समाधान - वृद्धि द्वारा कही गई छह वृद्धियों और छह हाक्यिोंके अवान्तर भेदोंका कथन करने के लिए यह प्ररूपणा आई है । वृद्धिप्ररूपणा के द्वारा काम चल जाता है, इसलिए इसका कथन करना निरर्थक है ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि वहाँ पर नहीं कहे गये अलग अलग प्रत्येक असंख्यात लोकप्रमाण षट्स्थानस्वरूप बन्धसमुत्पत्तिक, हतसमुत्पत्तिक और हतहतसमुत्पत्तिकरूप भेदका यहाँ पर कथन पाया जाता है। .* जिस प्रकार सत्कर्मस्थान हैं उसी प्रकार संक्रमस्थान हैं । ६ ५७३. जिस प्रकार बन्धसमुत्पत्तिक आदिके भेदसे अनेक प्रकारके सत्कर्मस्थान अनुभागविभक्ति में विस्तार के साथ कहे हैं उसी प्रकार यहाँ पर संक्रमस्थान भी जानने चाहिए, क्योंकि द्रव्यार्थिकनयकी अपेक्षा उनसे इनमें विशेष भेद नहीं है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । * तो भी उनकी प्ररूपणा करनी चाहिए । ५७४. तथापि पर्याय। थिंकनयका अनुग्रह करनेके लिए उनकी यहाँ पर पुनः प्ररूपणा करनी चाहिए यह इसका तात्पर्य है । अब उनका कथन करने पर उनमेंसे संक्रमस्थानोंकी प्ररूपणा में ये चार अनुयोग द्वार होते हैं - समुत्कीर्तना, प्ररूपणा, प्रमाण और अल्पबहुत्व । उनमें से समुत्कीर्तना
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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