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________________ १४८ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे * अण्णयरस्स । ९ ५३८. मिच्छाइट्ठि-सम्म इट्टीणमण्णदरस्स तदुभयविसयसा मित्तसंबधो भद हो । [ बंधगो ६ * अण्णदरस्स । ६५४२. कुदो ? मिच्छाइट्ठ-सम्माइट्ठीणं तदुवलद्धीए विरोहाभावादो | * श्रवत्तव्वसंकमो कस्स ? ६५४३. सुगमं । * विदियसमयउवसमसम्माइ डिस्स | * सम्मत्त सम्मामिच्छत्तापमणतगुणहाणि संकमो कस्स १ ५३६. सुगममेदं सामित्तसंबंधविसेसा वेक्खं पुच्छासुतं । * दंसणमोहणीयं खवेंतस्स । ५४०. कुदो दंसणमोहक्खवणादो अण्णत्थेदेसिमणुभागघादासंभवादो तदो अण्णविसयपरिहारेणेत्थेव सामित्तमिदि सम्ममवहारिदं । * अवट्ठाणसंकमो कस्स ? ६ ५४१. सुगमं । त्ति * अन्यतर जीव उनका स्वामी है । ६५३८. मिथ्यादृष्टि और सम्यग्दृष्टि इनमें से अन्यतरके उन दोनोंके स्वामित्वका सम्बन्ध है। यह उक्त कथनका तात्पर्य है । ६५४१. यह सूत्र सुगम है । * अन्यतर जीव उसका स्वामी है। * सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व के अनन्तगुणहानिसंक्रमका स्वामी कौन है ? § ५३६. स्वामित्वके सम्बन्धविशेषकी अपेक्षा करनेवाला यह पृच्छासूत्र सुगम है । * दर्शनमोहनीयकी क्षपणा करनेवाला जीव उसका स्वामी है । ६५४०. क्योंकि दर्शनमोहनीयकी क्षपणाके सिवा अन्यत्र इन प्रकृतियोंका अनुभागघात होना सम्भव है, इसलिए अन्य विषयके परिहार द्वारा यहीं पर स्वामित्व है इस प्रकार सम्यके प्रकारसे श्रवधारण किया । * उनके अवस्थानसंक्रमका स्वामी कौन है ? ६ ५४२. क्योंकि मिथ्यादृष्टि और सम्यग्दृष्टिके उसकी उपलब्धि होनेमें विरोध नहीं आता । * उनके अवक्तव्यसंक्रमका स्वामी कौन है ? ६५४३. यह सूत्र सुगम है । * द्वितीय समयवर्ती उपशमसम्यग्दृष्टि जीव उसका स्वामी है ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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