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________________ गा०५८ ] उत्तरपयडिअणुभागसंक मे बडीए सामित्त १४७ * सामित्तं । ५३४. समुत्तिणाणंतरं सामित्तमहिकयं ति अहियार संभालणमुत्तमे । * मिच्छ्रत्तस्स छविवहा वड्डी पंचविहा हाणो कस्स ? ९५३५. किमिच्छाट्ठिस्स आहो सम्माइट्टिस्स, किं वा दोहं पि पयदसामित्त मिदि पुच्छा क्या होड़ । एत्थ पंचविहा हाणि त्ति वृत्ते अगंतगुणहाणि मोत्तृण सेसपंचहाणीगं संगो कायो । * मिच्छाइट्ठिस्स अण्णयरस्स । ९ ५३६. गात्र सम्माड्डिम्म मिच्छता भागविसयाीणमत्थि संभवो, तत्थ तब्धाभावादो | ण च वषेण विणा अणुभागसंक्रमस बढी लब्भदे, तहागुवलद्धीदो । तहा पंचविहा हाणी वितत्थ पन्थि, सुड्डु वि मंदविसोहीए कंडयघादं करेमाणसम्माइट्ठिम्भि अनंतगुणहाणिं मोत्तॄण संसपंचहाणीणमसंभवादो । तदो मिच्छाइट्ठिस्सेव णिरुद्धध्वनिपंचहाणीणं सामित्तमिद सुणिण्णीदत्थमेदं सुतं । अण्णदरग्गहणमेत्थोग | हणादिविसेसप डिसेकंद | * अतगुणहाणो अवदिकमो कस्स ? ६५३७. सुगममं सुतं, पण्हमेत्तवावारादो । * अब स्वामित्वको कहते हैं । ६५३१. समुत्कीर्तन के बाद स्वामित्व अधिकृत है, इसलिए अधिकारकी सम्हाल करने के लिए यह सूत्र आया है । * मिथ्यात्वको छह प्रकारकी वृद्धियों और पाँच प्रकारकी हानियोंका स्वामी कौन है ? ९५३५. क्या मिध्यादृष्टि या सम्यग्दृष्टि या दोनों ही प्रकृतमें स्वामी हैं इस प्रकार पृच्छा की गई है । यहाँ पर पाँच प्रकारकी हानि ऐसा कहने पर अनन्तगुणहानिको छोड़कर शेष पाँच हानियोंका संग्रह करना चाहिए । * अन्यतर मिथ्यादृष्टि जीव उनका स्वामी है । § ५३६. सम्यग्दृष्टिके तो मिथ्यात्यकी अनुभागविषयक छह वृद्धियोंकी सम्भावना है नहीं, क्योंकि वहाँ पर मिथ्यात्वका बन्ध नहीं होता । और बन्धके विना अनुभागसंक्रमकी वृद्धि नहीं उपलब्ध होती, क्योंकि ऐसा पाया नहीं जाता । उसी प्रकार पाँच हानियाँ भी वहाँ पर नहीं हैं, क्योंकि अत्यन्त मन्द विशुद्धि भी काण्डकात करनेवाले सम्यग्दृष्टि जीवके अनन्तगुणहानिको छोड़कर शेष पाँच हानियाँ असम्भव हैं । इसलिए मिध्यादृष्टिके ही विवक्षित छह वृद्धियों और पाँच हानियोंका स्वामित्व है इस प्रकार इस सूत्र का अर्थ सुनिशीत है । यहाँ पर सूत्र में जो 'अन्यतर' पदका ग्रहण किया है सो वह अवगाहना आदि विशेषके निषेध के लिए जानना चाहिए । * अनन्नगुणहानि और अवस्थितसंक्रमका स्वामी कौन है ? ६५.३७. यह सूत्र सुगम है, क्योंकि प्रश्नमात्र में इसका व्यापार हुआ है ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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