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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ बंधगो ६ अंतरिदस्स पुणो उबडपोग्गलपरियट्टावसाणे सम्मत्तुप्पायणतदियसमयम्मि पयदं तरसमाणणोत्र दो । * अवन्त्तव्वसंकामयंतरं केवचिरं कालादो होइ ? ६३६६. सुगमं । * जहणणेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो । ६ ३६७. तं कथं ? पढमसम्मत्तप्पत्तिविदियसमए अवत्तव्त्रसंकमं कादूणावट्ठिदसंकमेणंतरिदस्स सव्वलहुमुव्वेल्लणाए णिस्संतीकरणानंतरं पडिवण्णसम्मत्तस्स विदियसमए लद्धमंतरं होई । * उक्कस्सेण उवढपोग्गलपरियहं । ११० ६ ३६८. तं जहा - पढमसम्मत्तुप्पायणविदियसमए अवत्तव्त्रं काढूणंतरिय उपोग्गलपरियट्टावसाणे गहिदसम्मत्तस्स विदियसमए लद्धमंतरं होई । * सेसाणं कम्माणं मिच्छत्तभंगो । $ ३६६. एत्थ सेसग्गहणेण च तमोहपयडीणं सव्वासिं संगहो कायव्वो । तेसिंमिच्छत्तभंगेण भुजगार-अप्पयरावट्ठिदसंकामयाणं जहण्णुक्कस्संतरपरूवणा कायव्या, विसेसा उद्वेलनाकी अन्तिम फालिका पतन करके अन्तरको प्राप्त हुए अवस्थितपदके पुनः उपार्धपुद्गल परिवर्तन के अन्तमें सम्यक्त्वको उत्पन्न कर उसके तीसरे समय में प्रकृत अन्तरकालकी समाप्ति देखी जाती है । * अवक्तव्यसंक्रामकका अन्तरकाल कितना है ? ३६६. यह सूत्र सुगम है। * जघन्य अन्तर पल्यके असंख्यातवे भागप्रमाण है । ६ ३६७. शंका – वह कैसे ? समाधान — प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके दूसरे समय में अवक्तव्य संक्रमको करके तथा स्क्रम द्वारा जो अन्तरको प्राप्त हुआ है और अतिशीघ्र उद्वेलनाके द्वारा सम्यक्त्व प्रकृतिका भाव करने के बाद सम्यक्त्वको प्राप्त हुए उस जीवके दूसरे समय में पुनः अवक्तब्य संक्रम करने पर उसका उक्त अन्तरकाल प्राप्त होता है। * उत्कृष्ट अन्तर उपार्ध पुद्गल परिवर्तनप्रमाण है । ६३६८. यथा - प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करनेके दूसरे समय में वक्तव्यसंक्रमको करने के बाद उसका अन्तर करके उपार्ध पुद्गल परिवर्तनप्रमारण कालके अन्तमें सम्यक्त्वको ग्रहण करनेके दूसरे समयमें पुनः अवक्तब्यसंक्रम करने पर उक्तप्रमाण उत्कृष्ट अन्तरकाल प्राप्त होता है । । * शेष कर्मों का भङ्ग मिथ्यात्वके समान है । § ३६६. यहाँ पर सूत्रमें शेष पदके ग्रहण करनेसे चारित्रमोहनीयसम्बन्धी सब प्रकृतियोंका संग्रह करना चाहिए। तात्पर्य यह है कि उनके मिथ्यात्व के भङ्गके समान भुजगार, अल्पतर और
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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