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________________ ६ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ बंधगो ६ बहुदरादो पुव्विल्लसमयसंकमादो एहिमोसकाविदे इदानीमपकर्षिते न्यूनीकृतेऽल्पतराणि स्पर्धकानि संक्रमयतोत्यल्पतरसंक्रम इति सूत्रार्थसंबंधः । सुगममन्यत् । * श्रसक्काविदे एहिं च तत्तियाणि संकामेदि त्ति एस अवट्ठिदसंकमो । $ ३३६. अनंतरव्यतिक्रान्तसमये वर्तमानसमये च तावतामेव स्पर्धकानां संक्रमोऽवस्थितसंक्रम इति यावत् । * श्रसक्काविदे असंकमादो एरिहं संकामेदित्ति एस अवन्त्तव्वसंकमो । § ३३७. ओसकाविदे अणंतरहेट्ठिमसमये असंकमादो संकमविरहलक्खणादो अवस्था - विसेसादो हमिदाणिं वट्टमाणसमये संकामेदि त्ति संकमपजाएण परिणामेदि त्ति एस एवंलक्खणो अवत्तव्त्रसंकमो । असंकमादो जो संकमो सो अवत्तव्त्रसंकमो त्ति भावत्थो । * एदेण अट्ठपदे सामित्तं । ९३३८. एदेणाणंतरपरूविदेण अट्ठपदेण णिच्छिदसरूवाणं भुजगारादिपदाणं सामित्तमिदाणिं कस्सामो त्ति पहण्णावकमेदं । किमट्ठमेत्थ सामित्तादीनं जोणोभूदा सम्मुत्तिणा सुत्तारेण ण परूविदा ? ण, सुगमत्ता हिप्पाएण तदपरूवणादो । ग्रहण करना चाहिए । अथवा पहलेके समयमें किये गये बहुतर संक्रमसे 'एण्डिमोसक्काविदे' अर्थात् वर्तमान समय में अपकर्षित करने पर अर्थात् कम करने पर अल्पतर स्पर्धकोंको संक्रमित करता है यह अल्पतरसंक्रम है इस प्रकार सूत्रका अर्थके साथ सम्बन्ध है । शेष कथन सुगम है। * अनन्तर व्यतीत हुए समयमें और वर्तमान समय में उतने ही स्पर्धकोंका संक्रम करता है यह अवस्थितसंक्रम है । ९ ३३६. अनन्तर व्यतीत हुए समयमें और वर्तमान समयमें उतने ही स्पर्धकोंका संक्रम अवस्थितसंक्रम है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । * अनन्तर व्यतीत हुए समयमें संक्रम न करके वर्तमान समयमें संक्रम करता है यह वक्तव्य संक्रम है । ९ ३३७. 'सक्काविदे' अर्थात् अनन्तर व्यतीत हुए समयमें असंक्रमसे अर्थात् संक्रमविरहलक्षण अवस्थाविशेषसे श्राकर 'एण्डिं' अर्थात् वर्तमान समयमें 'संकामेदि' अर्थात् संक्रम पर्यायसे परिणत कराता है 'एस' अर्थात् इस प्रकारके लक्षणवाला अवक्तव्यसंक्रम है । असंक्रमरूप अवस्थाके बाद जो संक्रम होता है वह अवक्तव्यसंक्रम है यह इस कथनका भावार्थ है । * अब इस अर्थपदके अनुसार स्वामित्वका कथन करते हैं । ९३३८. इस अनन्तर पूर्व कहे गये अर्थपदके अनुसार जिनके स्वरूपका निर्णय कर लिया है ऐसे भुजगार आदि पोंके स्वामित्वको इस समय बतलाते हैं, इस प्रकार यह प्रतिज्ञावाक्य है । शंका- यहाँ पर स्वामित्व श्रादिकी योनिरूप समुत्कीर्तनाका सूत्रकारने कथन क्यों नहीं किया ? समाधान — नहीं, क्योंकि समुत्कीर्तनाका कथन सुगम है इस अभिप्रायले सूत्रकारने उसका कथन नहीं किया ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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