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________________ गा० ५८] उत्तरपयडिअणुभागसंकमे भुजगारसंकमस्स समुक्कित्तणा ६५ ६ ३३२. तम्मि भुजगारसंकमे भुजगारादिपदाणं सरूवविसयगिणयजणणट्ठमट्ठपदं वण्णइस्सामो ति बुत्तं होइ । किं तमट्ठपदमिदि पुच्छासुत्तमाह तं जहा। ६३३३. सुगमं । * जाणि एपिहं फद्दयाणि संकामेदि अणंतरोसकाविदे अप्पदरसंकमावो बहुगाणि त्ति एस भुजगारो। ६३३४. एदस्स भुजगारसंकमसरूवाणिरूवयसुत्तस्स अत्थो वुच्चदे-जाणि अणुभागफहयाणि एण्हिं वट्टमाणसमए संकामेदि ताणि बहुआणि । कत्तो ? अणंतरोसकाविदे अप्पदरसंकमादो अणंतरविदिक्कंतसमए थोवयरादो संकमपरिणदफद्दयकलावादो त्ति भणिदं होदि ? एस भुजगारो एवंलक्षणो भुजगारसंकमो ति दटुव्वो। थोवयरफद्दयाणि संकामेमाणो जाधे तत्तो बहुवयराणि फद्दयाणि संकामेदि सो तस्स ताधे भुजगारसंकमो त्ति भावत्यो। * ओसक्काविदे बहुदरादो एएिहमप्पदराणि संकामेदि त्ति एस अप्पदरो। हु ३३५. एत्थ ओसक्काविदसद्दो अणंतरवदिक्कतसमयवाचओ ति घेत्तव्यो । अथवा ६ ३३२. उस भुजगारसंक्रमके विषयमें भुजगार आदि पदोंका स्वरूपविषयक निर्णयको उत्पन्न करनेके लिए अर्थपदका कथन करते हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है । वह अर्थपद क्या है ऐसी जिज्ञासाके अभिप्रायसे पृच्छासूत्रको कहते हैं * यथा ६ ३३३, यह सूत्र सुगम है। * जिन स्पर्धकोंको वर्तमान समयमें संक्रमित करता है वे अनन्तरपूर्व समयमें संक्रमको. प्राप्त हुए अल्पतर संक्रमसे बहुत हैं यह भुजगारसंक्रम है। ६३३४. अब भुजगारसंक्रमके स्वरूपका कथन करनेवाले इस सूत्रका अर्थ कहते हैं-जिन अनुभागस्पर्धकोंका ‘एपिह' अर्थात् वर्तमान समयमें संक्रमण करता है वे बहुत हैं । किससे बहुत हैं ? 'अणंतरोसक्काविदे अप्पदरसंकमादो' अर्थात् अनन्तर व्यतीत हुए पूर्व समयमें संक्रमरूपसे परिणत हुए स्तोकतर स्पर्धककलापसे बहुत हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है। 'एस भुजगारो' अर्थात् इस प्रकारके लक्षणवाला भुजगारसंक्रम है ऐसा जानना चाहिए। स्तोकतर स्वर्धकोंका संक्रम करनेवाला जीव जब उनसे बहुतर स्पर्धकोंका संक्रम करता है वह उसका उस समय भुजगार संक्रम होता है यह इसका भावार्थ है। ___ * अनन्तर पूर्व समयमें संक्रमको प्राप्त हुए बहुतर स्पर्धर्कोसे वर्तमान समयमें अल्पतर स्पर्धकोंको संक्रमित करता है यह अल्पतरसंक्रम है। ६ ३२५. इस सूत्रमें 'ओसक्काविद' शब्द अनन्तर व्यतीत हुए समयका वाची है ऐसा यहाँ
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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