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________________ ६२ जयपुर (खानिया) तस्वचर्चा और उसकी समीक्षा वे यह सूचित कर रहे हैं कि व्यवहारहेतुता किसी प्रकारसे क्यों न मानी गई हो, अन्यके कार्य में वह वास्तविक न होनेसे इस अपेक्षासे समान है। अर्थात् अन्यका कार्य करनेमें धर्मद्रव्यके समान दोनों ही उदासीन है। अब रही प्रेरक निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्री के अनुरूप परिणमनकी बात सो यह हम अपर पक्षसे ही जानना चाहेंगे कि यह अनुरूप परिणमन क्या वस्तु है : उदाहरणार्थ कर्मको निमित्त कर जीवके भायसंसारको सृष्टि होती है और जीवके राग-द्वेषको निमित्त कर कर्मकी सृष्टि होती है । यहाँ कर्म निमित्त है और राग-द्वेष परिणाम नैमित्तिक। इसी प्रकार राग-द्वेष परिणाम निमिप्स हैं और कर्म नैमित्तिक । तो क्या इसका यह अर्थ लिया जाय कि निमित्तमें जो गुणधर्म होते हैं वे नैमित्ति कमें संक्रमित हो जाते हैं, या क्या इसका यह अर्थ लिया जाय कि जिसको उपादान निमित्त बनाता है उस जैसा क्रिया परिणाम या भाव परिणाम अपनी उपादान शक्तिके बलसे वह अपना स्वयं उत्पन्न कर लेता है ? प्रथम पक्ष तो इसलिए ठीक नहीं, क्योंकि एक द्रब्यके गुण-धर्मका दूसरे व्रव्यमें संक्रमण नहीं होता। ऐसी अवस्थामें दूसरा पक्ष ही स्वीकार करना पड़ता है । समयसार गाथा ८०-८२ की आत्मख्याति टीकामे निमित्तीकृत्य' पदका प्रयोग इसी अभिप्रायसे किया गया है। अन्य दृष्य दुसरेके कार्य में स्वयं निमित नहीं है। किन्तु अन्य प्रश्यको लक्ष्य करआलम्बन कर अन्य जिस द्रव्यका परिणाम होता है उसकी अपेक्षा उसमें प्रेरक निमित्त व्यवहार किया जाता है । पुद्गल द्रव्य अपनी विशिष्ट स्पर्श पर्यायके कारण दूसरेका सम्पर्क करके अपनी उपादान शक्तिके बलसे जिसका सम्पर्क किया है उसके समान कर्मरूपसे परिणम जाता है और जीव अपने कषायके कारण दूसरेको लक्ष्य करके अपनी उपादान शक्तिके बलसे जिसको लक्ष्य किया है वैसा रागपरिणाम अपनेमें उत्पन्न कर लेता है । यही संसार और तदनुरूप कर्मबन्धका बीज है। यही कारण है कि प्रत्येक मोक्षार्थीको बारमस्वभावको लक्ष्यमें लेने का उपदेश आगममें दिया गया है, इसलिए प्रकृतमें यही समझना चाहिए कि प्रत्येक उपादानके वायमें जो वैशिष्टय आता है उसे अपनी आन्तरिक योग्यता वश स्वयं उपादान ही उत्पन्न करता है, बाह्य सामग्री नहीं। फिर भी कालप्रत्यासत्ति वश क्रियाकी और परिणामकी सदृशता देखकर जिसके लक्ष्यसे वह परिणाम होता है उसमें प्रेरक निमित्त व्यवहार किया जाता है। अन्य व्यके कार्य में प्रेरक निमित्त श्यवहार करनेकी यह सार्थकता है । इसके सिवाय अपर पक्ष ने इसके सम्बन्धमें अन्य जो कुछ भी लिखा है वह पथार्थ नहीं है। हमने जो यह लिखा है कि प्रेरक कारणले बलसे किसी व्यके कार्यको आगे-पीछे कभी भी नहीं किया जा सकता है, वह म ार्थ लिखा है, क्योंकि उपादानके अभावमें जब कि बाए सामग्रीमें प्रेरक निमित्त व्यवहार भी नहीं किया जा सकता तो उसके द्वारा कार्यका आगे-पीछे किया जाना तो अत्यन्त ही असम्भव है। कर्मकी नानारूपता भावसंसारके उपादानकी नानारूपताको तथा भूमिको विपरीतता बीजकी वैसी उपादानताको ही सचित करती है। अतएच उपादानके अभावमें जब कि बाह्य सामग्रीमें प्रेरक निमित व्यवहार ही नहीं किया जा सकता, ऐसी अवस्थामें अपर पक्ष द्वारा 'प्रेरक निमित्तके बलसे कार्य कभी भी किया जा सकता है ऐसा लिखा जाना उसके एकान्त आग्रहको ही सूचित करता है । अपर पक्षने महापर शीतऋतु, कपड़ा और दर्जीका उदाहरण देकर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि कपडेसे बननेवाले कोट आदिके समान जितने भी कार्य होते हैं उनमें एकमात्र निमित्त व्यवहारके योग्य बाद्य सामग्रीकाही बोलबाला है। इस सम्बन्धमें अपर पक्ष अपने एकान्त झाग्रहवश क्या लिखता है उसपर ध्यान दीजिए। उसका कहना है कि ANA
SR No.090217
Book TitleJaipur Khaniya Tattvacharcha Aur Uski Samksha Part 1
Original Sutra AuthorVanshidhar Vyakaranacharya
AuthorDarbarilal Kothiya
PublisherLakshmibai Parmarthik Fund Bina MP
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Questions and Answers
File Size14 MB
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