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________________ ४८ जयपुर (खानिया) तत्त्वचर्षा और उसकी समीक्षा सम्यक् जानकारी हो और साथ ही उससे भिन्न कार्यके कारण उपस्थित न हों। इतने पर भी इस कारणमें इस कार्यके करनेकी आन्तरिक योग्यता है ऐसा ज्ञान तो अनुमान प्रमाणसे ही होता है । अतः सभी कार्योंका काल सर्वथा नियत नहीं है ऐसा दावा अपर पक्ष अपने प्रत्यक्ष प्रमाणके बलपर तो त्रिकालमें कर नहीं सकता। अब रह गया यह तर्क 'कि किसीने कार्योंका कोई कम नियत भी नहीं किया है, अतः आगे पीछे करनेका प्रश्न ही नहीं उठता।' सो यह तर्क पढ़नेमें जितना सुहावना लगता है उतना यथार्थताको लिये हुए नहीं है, क्योंकि हमारे समान सभी श्रुतज्ञानो 'जं जस्स जम्मि देसे' इत्यादि तथा 'पुब्वपरिणामजुतं कारणभावेण बट्टदे दवं' इत्यादि श्रुति के बलसे यह अच्छी तरहसे जानते है कि जो कार्य जिस कालमें और जिस देशमें जिम विधिसे होता है वह कार्य उस काल और उस देशमें उस विधिसे निग्रमसे होता है इसमें इन्द्र, चक्रवर्ती और स्वयं तीर्थकर भी परिवर्तन नहीं कर सकते । अतएव श्रुतिके बल पर हमारा ऐसा जानना प्रमाण है । और वह श्रुति दिव्यध्वनिके आधारसे लिपिबद्ध हुई है, इसलिए दिव्यध्वनिक बलपर बह श्रुति भी प्रमाण है । और वह दिव्यध्वनि केवलज्ञानके आधारपर प्रवृत्त हुई है, इसलिए केवलज्ञानके बलपर दिव्यध्वनि भी प्रमाण है । और केवलज्ञानकी ऐसी महिमा है कि मह तीन लोक और विकालवर्ती समस्त पदार्थोको वर्तमानके समान जानता है। इसलिए केवलज्ञान प्रमाण है। यहाँ यह तो है कि प्रत्येक पदार्थका जिस कालमें और जिस देशमें जिस विधिसे परिणमन होने का नियम है वह स्वयं होता है, कुछ केवलज्ञानके कारण नहीं होता। परन्तु साथमें बाहरी नियम है ::त्ये:. से पत्रिका होनेका नियम है उसे केवलज्ञान उसी प्रकार जानता है । ऐसा ही एनमें ज्ञेय-ज्ञायक सम्बन्ध है । अतः कार्योंका किसीने कोई क्रम नियत नहीं किया यह लिखकर सम्यक् नियतिका निषेध करना उचित नहीं है। एक ओर तो अपर पश 'कायौंका किसीने कोई क्रम नियत भी नहीं किया' यह लिखकर कार्योका आगे-पीछे होना मानना नहीं चाहता और दूसरी ओर उत्कर्षण आदिके द्वारा कर्मवर्गणाओंका आगे-पीछे उदयमें आना भी स्वीकार करता है । यह क्या है ? इसे उस पक्षकी मान्यताको विडम्बना ही कहनी चाहिए । स्पष्ट है कि अपर पक्षने 'सभी कार्योका काल सर्वथा नियत नहीं है। इत्यादि लिखकर जो सभी कार्योंके क्रम नियमितपनेका निषेध किया है वह उक्त प्रमाणों के बलसे तर्ककी कसौटी पर कसनेपर यथार्थ प्रतीत नहीं होता । ३. अपर पक्ष ने अपने तीसरे हेतुमें कर्मस्थिति आदिके आधारसे विचार कर यह निष्कर्ष फलित करनेकी चेष्टा की है कि बन्धके समय जो स्थितिबन्ध होता है उसमें बन्धावलिके बाद उत्कर्षणादि देखे जाते है. अतः जो कार्य जिस समय होना है उसे आगे-गीछे किया जा सकता है । यद्यपि इस विषयपर विशेष विचार शंका पाँचके अन्तिम उत्तरमें करनेवाले हैं। यहाँ तो मात्र इवना ही सुचित करना पर्याप्त है कि सत्तामें स्थित जिस कर्मका जिस काल में जिसको निमित्तकर उत्तार्पण आदि होना नियत है उस कर्मका उस काल में उसको निमित्तकर ही वह होता है, अन्यका नहीं ऐसी बन्धके समय ही उसमें योग्यता स्थापित हो जाती है। कर्मशास्त्र में कर्मफी बन्ध, उदय और उत्कर्षणादि जो दस अवस्थाएँ ब्रतलाई है वे इसी आधारपर बतलाई गई हैं । हरे, जिस व्यवस्थाको कर्मशास्त्रमें स्वीकार नहीं किया गया है, कर्ममें ऐसे किसी कार्यका केवल बाह्य सामग्री के बलपर अपर पक्ष होना सिद्ध कर सके तो अवश्य ही यह माना जा सकता है कि यह कार्य बिना उपादानशक्तिके केवल बाहा सामग्रीके बलपर कर्ममें हो गया । व्यवस्था व्यवस्था है । व्यवस्थाके अनुसार कार्यका होना अनियममें नहीं आता । कर्मशास्त्रके प्रगाढ़ अभ्यासका हम दावा तो नहीं करते । परन्तु कर्मशास्त्रके थोड़े बहुत अभ्यासके बलपर इतना अवश्य ही निर्देश कर देना चाहते हैं कि कर्मशास्त्रको व्यवस्थाके
SR No.090217
Book TitleJaipur Khaniya Tattvacharcha Aur Uski Samksha Part 1
Original Sutra AuthorVanshidhar Vyakaranacharya
AuthorDarbarilal Kothiya
PublisherLakshmibai Parmarthik Fund Bina MP
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Questions and Answers
File Size14 MB
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