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________________ संका १ और उसका समाधान ७ जिस कालमें जिस देशमें जिस विधिसे होना निश्चित है सस व्यकी यह पर्याय उस कालमें उस देश में उस विधिसे नियमसे होती है। २. अपर पक्षका अपने पक्ष के समर्थनमें दूसरा तर्क है कि सभी कार्योंका काल सर्वथा नियत है ऐसा प्रत्यक्षसे ज्ञात नहीं होता। इसके साथ उस पक्षका यह भी कहना है कि उनका किसीने कोई क्रम भी नियत नहीं किया है, अतः कौन कार्य पहले होनेवाला बादमें हुआ और बादमें होनेवाला पहले हो गया यह प्रश्न ही नहीं उठता । यह अपर पक्षका अपने कथनके समर्थन में वक्तव्यका सार है। इस द्वारा अपर पक्षने अपने पक्षके समर्थन में दो तर्क उपस्थित किये है। प्रथम सर्कको उपस्थित कर वह अपने इन्द्रिय प्रत्यक्ष और मानस प्रत्यम (जो परोक्ष है) द्वारा यह दावा करता है कि वह अपने उक्त शान द्वारा प्रव्य अवस्थित कार्यकरणक्षम उस योग्यताका प्रत्यक्ष ज्ञान कर लेता है जिसे सभी आचार्योने अतीन्द्रिय कहा है। किन्तु उस पक्षका ऐसा दावा करना उचित नहीं है, क्योंकि सभी आचार्योंने एक स्वरसे कार्यको हेतु मानकर उस द्वारा विवक्षित कार्य करने में समर्थ अन्तरंग योग्यताकं ज्ञान करनेका निर्देश क्रिया है। आचार्य प्रभाचन्द्र प्रमेयममलमार्तण्ड प० २३७ में लिखते है तत्रापि हि कारणं कार्येऽनुपक्रियमाणं यावत्प्रतिनियतं कार्यमुत्पादयति तावत्सर्व करमान्नोत्पादयतीति चोद्ये योग्यतेव शरणम् । उसमें भी कार्यसे उपक्रियमाण न होता हुआ कारण जब तक प्रतिनियत कार्यको उत्पन्न करता है तब तक सबको क्यों उत्पन्न नहीं करता ऐसा प्रश्न होनेपर आचार्य कहते है कि योग्यता ही शरण है । इस उल्लेखमें योग्यताको परोक्ष मानकर ही यह प्रश्न किया गया है कि कार्य कारणका तो उपकार करता नहीं, फिर भी वह प्रतिनियत कार्यको ही क्यों उत्पन्न करता है, सब कार्यों को क्यों उत्पन्न नहीं करता? स्पष्ट है कि इस उल्लेख में प्रतिनियत कार्य द्वारा कारणमें निहित प्रतिनियत कार्यकरणक्षम योग्यताका ज्ञान करामा गया है । इस प्रकार प्रकृतमें कार्यहेतुफो ही मान्यता दी गई है, हमारे या अपर पक्ष के प्रत्यक्ष प्रमाणको नहीं। स्वामी समन्तभद तो इसी तथ्यको और भी स्पष्ट शब्दों में सूचित करते हुए स्वयंभूस्तोत्रमें सुपार्श्व जिनकी स्तुतिके प्रसंगसे कहते हैं अलंध्यशक्तिर्भवितव्यतेयं हेतुद्वयाविष्कृतकार्यलिंगा। अनीश्वरो जन्तुरहंक्रियातः संहत्य कार्येष्विति साध्ववादीः ॥३॥ हेतुद्वयसे उत्पन्न होनेवाला कार्य हो जिसका ज्ञापक है ऐसी यह भवितव्यता अध्यशक्ति है । किन्तु मैं इसे कर सकता हूँ ऐसे विकल्पसे पीड़ित हुआ प्राणी बाह्य सामग्रीको मिलाकर भी कार्योंके करने में समर्थ नहीं होता । हे जिन ! आपने यह ठीक ही कहा है ।।३।। इसमें भी यही बतलाया गया है कि कार्यको देखकर ही यह अनुमान किया जाता है कि इस कारणमें इस कालमें इस कार्यक्रो उत्पन्न करनेकी योग्यता रही है, तभी यह कार्य हुआ है । यद्यपि कहीं-कहीं कारणको देखकर भी कार्यका अनुमान किया जाता है, यह सच है, परन्तु इस ' पद्धतिसे कार्यका ज्ञान वहीं पर सम्भव है जहां पर विवक्षित कार्यवे अविकल कारणोंकी उपस्थितिकी
SR No.090217
Book TitleJaipur Khaniya Tattvacharcha Aur Uski Samksha Part 1
Original Sutra AuthorVanshidhar Vyakaranacharya
AuthorDarbarilal Kothiya
PublisherLakshmibai Parmarthik Fund Bina MP
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Questions and Answers
File Size14 MB
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