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________________ शका ३. और उसका समाधान येनांशेन परित्रं तेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति । येनांशेन तु रागस्तेनाशेनास्य बन्धनं भवति ॥२१४।। इस जीवके जिस अंशसे सम्यग्दर्शन है उस अंशसे इसके बन्धन नहीं है। परन्तु जिस अंशसे राग है उस अंशसे इसके बन्धन है । जिस अंशसे इसके ज्ञान है उस अंशरो इसके बंधन नहीं है। परन्तु जिस अंशसे राग है उस अंशसे इराके बन्धन है । जिस अंशसे इसके चारित्र है उस अंशसे इसके बन्धन नहीं है। परन्तु जिस अंशसे इसके राग है उस अंशसे इसके बन्धन है ॥२१.१ । आगे इसी बागमके २१६ वें श्लोकमें थे इसी तम्पका समर्थन करते हुए पुनः कहते हैं दर्शनमात्मदिनिश्चितिरात्मपरिमानमिष्यते बोधः । स्थितिरात्मनि चारित्रं कुत एतेभ्यो भवति बन्धः ॥२१६।। आत्मश्रद्धाका नाम सम्यग्दर्शन है, आत्मज्ञानको सम्यग्ज्ञान कहते हैं और आत्मामें स्थितिका नाम सम्यश्चारित्र है, इनसे बन्ध कैसे हो सकता है ॥२१६।। श्री समयसारजी में कहा है रत्तो बंधदि कम्मं मुंचदि जीवो विरागसंपत्तो। एसो जिणोवदेसो सम्हा कम्मेसु मा राज ।।१५०॥ रागी जीव कर्म बांधता है और वैराग्य प्राप्त जीव कमसे छूटता है, यह जिनेन्द्र भगवान्का उपदेश है, इसलिए है भन्यजीव ! तू फर्मोमें प्रीति-राग मत कर । इसको टीकामें लिखा है यः खलु रक्तोऽवश्यमेव कर्म बध्नीयात् विरक एवं मुच्येतेत्ययमागमः सामान्येन रक्तत्वनिमित्तत्वाच्छुभमशुभमुभयकर्माविशेषेण बन्धहेतुं साधयति, तदुभयमपि कर्म प्रतिषेधयति । अर्थ–'रक्त अर्थात् रागी अवश्य कर्म बौधता है, और विरक्त अर्थात् विरागी ही कर्मसे छूटता है' ऐसा जो यह आगम वचन है सो सामान्यतया रागीपनकी निमित्तताके कारण शुभाशुभ दोनों कर्मोको अबिशेषतया बन्धके कारणरूप सिद्ध करता है और इसलिए धोनों कर्मोंका निषेध करता है ॥१४॥ इस प्रकार इस कथनसे स्पष्ट है कि शुभभाव चाहे वह दया हो, करुणा हो, जिनविम्ब दर्शन हो, व्रतोंका पालन करना हो, अन्य कुछ भी क्यों न हो यदि वह शुभ परिणाम है तो उससे मात्र बन्ध ही होता है, उससे संघर, निर्जरा और मोक्षकी सिद्धि होना असम्भव है । जिस प्रकार कोई मनुष्य भोजन करने के बाद भी यदि यह मानता है कि मेरे उपवास है उसी प्रकार पर द्रव्यमें प्रीति करनेवाला उससे यदि अपनी कर्मक्षपणा मानता है तो उसका ऐसा मानना आगम, अनुभव और युक्ति तीनों के विरुद्ध है। श्री समयसारजीमें सम्यग्दृष्टिको जो अनन्धक कहा है इसका यह अर्थ नहीं कि उसके बम्भका सर्वथा प्रतिषेध किया है। उसका तो मात्र यही अर्थ है कि सम्पदृष्टिके रागभावका स्वामित्व न होनेसे उसे अबन्धक कहा है, क्योंकि सम्यग्दृष्टि और रागदृष्टिमें बड़ा अन्तर है । जो सम्यग्दृष्टि होता है वह रागदृष्टि नहीं होता और जो रागदृष्टि होता है वह सम्यग्दृष्टि नहीं होता। इसी अभिप्रायको ध्यान में रखकर धी समयसारजीमें कहा भी है
SR No.090217
Book TitleJaipur Khaniya Tattvacharcha Aur Uski Samksha Part 1
Original Sutra AuthorVanshidhar Vyakaranacharya
AuthorDarbarilal Kothiya
PublisherLakshmibai Parmarthik Fund Bina MP
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Questions and Answers
File Size14 MB
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