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________________ अहिंसाके आलोकमें मह चित्र पराक्रमी अहिंसककी वृत्तिका अवास्तविक चित्रण करता है । सच्चा अहिंसक अपने पराक्रमके द्वारा दोन-दुख लका उद्धार करता है, उस पर आई हुई विपत्तिको दूर करता है। दीन पर अपना शौर्य प्रदर्शन करने में अत्याचारोको आभा दिखाई देती है 1 बेचारा मग असमर्थ है, कमजोर है; किन्तु है पूर्णतया निर्दोष । उसके रक्तसे रजित शेरनी का मुख्न शौर्य का प्रतीक नहीं कहा जा सकता | वह क्रूरता और अत्याचारका चित्र आंखोंके आगे खड़ा कर देता है । शेरनों के समान महान शक्तिका सञ्चय प्रशंसनीय है. अभिवन्दनीय है, किन्तु अत्याचार के स्थानपर दीनोंका उसका शिकार बनाया जाना ''शक्तिः परेषा परिपीउनाय'' की सूक्तिको स्मरण करता है । यास्तविक अहिंसक गृहस्थ मजबूरी. की अवस्थामें विरोधी हिंसा करता है । ठीक शब्दों में तो यों कहना चाहिए कि उसे हिमा करनी पड़ती है । प्राणघात करने में उसे प्रसन्नता नहीं है, किन्तु बह करे क्या ? उमर पाम ऐसा कोई उपाय नहीं है जिमने बह कण्टकका उन्मूलन कार न्यायकी प्रतिष्ठा स्थापित कर सके । ज्याम्रो की सर्वदा पनुओंबी हिंसन-वृत्ति मानवका पथ-प्रदर्शन नहीं कर सकती; कारण उसमें पशुताकी और आमंत्रण है । उसमें पावके भा-याः- का प्रदर्शन है ! अतः शौर्यके नामपर अत्याचारी नियको आदर्श अहिंमाधारीकी तस्वीर नहीं कहा जा सकता। वह चिन अभ्याचारी और स्वार्थो (Tyrant and Selfish) प्राणोका वर्णन करता है । आदर्श अहिंसक मानवका नहीं। 'स्व रा ब जस्टिस जे० एल० जैनीने जैन-हिंसा के विषय में जो महत्त्वपूर्ण उद्गार प्रकट किये थे उनका अवतरण इतिहास स्मिय महाशय अपने भारतीय इतिहासमें इस प्रकार देते हैं-"जैन आचार-शास्त्र सब अवस्थावाले व्यक्तियों के लिए उपयोगी है । वे चाहे नरेश, योद्धा, व्यापारी, शिल्पकार अथवा कृषक हों, वह स्त्री-पुरुपकी प्रत्येक अवस्थाके लिए उपयोगी है । जितनी अधिक दयालुतासे बन सके अपना कर्तव्य पालन करो। मूत्र रूप में यह जैनधर्मका मुख्य सिमान्त है।" 1. "A Jain will do nothing to hurt the feelings of another person, man, woman, or child; nor will he violate the principles of Jainism, Jain ethics are meant for men of all position for kings, warriors, traders, artisans, agriculturists, and indeed for men and women in every walk of life. Do your duty and do it as humanely as you can this, in brief is the primary principle of Jainism." -V. Smith's History of India, P. 53
SR No.090205
Book TitleJain Shasan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSumeruchand Diwakar Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages339
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Culture
File Size7 MB
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