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________________ अहिंसाके आलोकमें ११५ pare anegyrists of war who say that without a periodical bleeding a race decays and loses its manhood : जर्मनीको युद्धस्थल में पहुँचनेकी प्रेरणा करनेवाला जर्मन विद्वान् नीटयो युद्धको मानो धर्मका अंग मानता हुआ जोरदार शब्दों में युद्धको प्रेरणा करता हुआ कहता है-'संकटमय जीवन व्यतीत करो। अपने नगरोंको विसूविमस ज्वालामुखी पर्वतकी बगल में बनाओ । युद्धकी तैयारी करो । मैं चाहता हूँ कि तुम लोग उनके समान बनो, जो अपने शत्रुओंकी खोज में रहते हैं। मैं तुम्हें युद्धकी मन्त्रणा देता हूँ, मेरी मन्त्रणा शान्ति की नहीं, विजयलाभकी है । तुम्हारा काम युद्ध करना हो, तुम्हारी शान्ति विजय हो । अच्छा युद्ध प्रत्येक उद्देश्यको उचित बना देता है। युद्धको घोरताने दयाकी अपेक्षा बड़े परिणाम पैदा किये है । लम्हारी को नहः, श्री 42. H.. रक्षा की है । तुम पूछते हो नेकी क्या है ? वीर होना ने की है । सुन्दर और चित्ताकर्षक होनेका नाम नेकी नहीं है। यह बात कुमारियों को कहने दो। आज्ञापालन और युद्धका जीवन व्यतीत करो। खाली लम्बी जिन्दगीसे क्या फायदा ?' वह यह भी कहता है ''जो देश दुर्बल और घृणास्पद बन गए हैं, वे यदि जीवित रहना चाहते है तो उन्हें युद्ध रूप औषध ग्रहण करनी चाहिये । मनुष्यको युद्ध के लिए शिक्षा दी जानी चाहिए और स्त्रियोंको मोसाओंके मनोरंजन करने में विश बनाना चाहिए । इसके सिवाय अन्य बातें बेसमझी की हैं। क्या आप यह कहते हैं कि पवित्र उद्देश्य के कारण युद्ध भी पवित्र हो जाता है ? मेस तो आपसे यह कहना है कि असछा बुद्ध प्रत्येक उद्देश्यको स्वयं पवित्रता प्रदान करता है।" १, Article on War' by Dr. George Santayana, Prof. of Harvard University. २. "विशालभारत" सन् ४१ से । 5. "For nations that are growing weak and contemptible war may be prescribed as a remedy, if indeed they want to go on living, Man shall be traited for war and woman for the recreation of the warrior; all else is folly. Do yo; say that a good cause halloweth even war ? I say to you a good war thalloweth any cause," Quoted in "Religion and society p. 199.
SR No.090205
Book TitleJain Shasan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSumeruchand Diwakar Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages339
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Culture
File Size7 MB
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