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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ज्ञानप्रदीपिका। स्थिरोदये स्थिरच्छत्रे स्थिरलग्नो भवेद्यदि । न मृतिर्न च नष्टं च न रोगशमनं तथा ॥१८॥ स्थिर लग्न हो और स्थिर छत्र हो और स्थिर उदय हो तो फल नहीं कहना चाहिये । अर्थात् 'मृत्यु नहीं हुई ' 'नष्ट नहीं हुआ' रागशान्ति नहीं हुई ;'इत्यादि इत्यादि कहना समुचित हैं । द्विदेहबोधया (१) रूढे छत्रे नष्टं न सिध्यति । न व्याधिशमनं शत्रुः सिद्धिविद्या न च स्थिरा ॥१६॥ द्विस्वभाव लग्न, द्विस्वभाव छत्र और द्विस्वभाव आरूढ़ हो तो नष्ट सिद्धि नहीं हुई ' व्याधि शमन नहीं हुआ' आदि निषेधात्मक उत्तर देना। चरराश्युदयारूढछत्रेषु स्यादिति स्थिता। नष्टसिद्धिर्न भवति व्याधिशांतिर्न विद्यते ॥२०॥ सर्वागमनकार्याणि भवन्त्येव न संशयः । ग्रहस्थितिबलेनैव एवं ब्र यात शुभाशुभम् ॥२१॥ घर राशि ही लग्न, छत्र और मारूढ़ हो तो भी नहीं, अर्थात् नष्ट सिद्धि न हुई, रोगशान्ति नहीं हुई, आदि बताना। आगमन सम्बन्धो प्रश्नों के उत्तर में 'हाँ' कहना चाहिये। इस प्रकार शुभाशुभ फल ग्रहों पर से कहना चाहिये । चरोभयस्थिताः सौम्याः सर्वकामार्थसाधकाः । आरूढछत्रलग्नेषु ऋरेष्वस्तं गतेषु च ॥२२॥ परेणापहृतं ब्रूयात् तत् सिध्यति शुभेषु च ।।२३।। घर और द्विस्वभाव राशियों पर यदि शुभ ग्रह हों तो कार्य सिद्ध होता हैं। आरूढ़ छ और लग्न में यदि अस्त होकर क्रूर ग्रह पड़े हों तो 'दूसरे ने चुराया है' ऐसा फल कहना। पर, यदि शुभग्रह हों तो 'मिल जायगा, ऐसा कहना । पंचमो नवमस्तेन नष्टलाभः शुभोदये। येषु पापेन नष्टाप्ती रूढ्यादित्रिकेषु च ॥२४॥ पंचम, नवम और सप्तम (?) शुभ से युक्त हों तो नष्ट बस्तु मिलेगी, अशुभ ग्रह से युक्त हों तो न मिलेगी। यही हाल लग्न, चतुर्थ और दशम का भी जानना। For Private and Personal Use Only
SR No.090186
Book TitleGyan Pradipika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamvyas Pandey
PublisherNirmalkumar Jain
Publication Year1934
Total Pages159
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size9 MB
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