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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra X ज्ञानप्रदीपिका | भ्रातृस्थानयुते पापे पंचमे वाऽशुभस्थिते । नष्टद्रव्याणि केनापि दीयन्ते स्वयमेव च ॥ २५ ॥ तृतीय स्थान में पाप ग्रह हों या पंचम में हो पाप ग्रह हों तो कोई स्वयं नष्ट द्रव्य दे जायगा | www.kobatirth.org x प्रश्नकाले शक्रचापे धूमेन परिवेष्टिते । ग्रहे द्रष्टुर्न भवति तत्तदाशासु तिष्ठति ॥ २६ ॥ X X X X X Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir X X X बृहस्पत्युदये स्वर्ण नष्टं नास्ति विनिर्दिशेत । शुक्रं चतुर्थके रौप्यं नष्टं नास्ति वदेद्ध्वम् ||२८|| सप्तमस्थे शनौ कृष्णलौहं नष्टं न जायते । बुधोदये पुर्नष्टं नास्ति चन्द्रे चतुर्थके ॥ २६ ॥ पृष्ठोदये शशांकस्शे नष्टं द्रव्यं न गच्छति । तद्राशिः शनिदुष्टश्चेन्नष्टं व्योम्नि कुजे न तत् २७॥ पृष्टोदय राशि लग्न में हो, उस में चंद्रमा बैठा हो तो नष्ट द्रव्य कहीं गया नहीं है ऐसा कहना | किन्तु वह पृष्ठोदय राशि यदि शनि से दृष्ट हो x X X X X For Private and Personal Use Only X कांसं नष्टं न भवति वंगं राहौ च सप्तमे । आरकूटं पंचमस्थे भानौ नष्टं न जायते ॥३०॥ ३१ लग्न में गुरु हो तो सोना नष्ट नहीं हुआ। चतुर्थ में शुक्र हो तो चान्दी नष्ट नहीं हुई। सप्तम में शनि हों तो लोहा नष्ट नहीं हुआ । लग्न में बुध हों तांबा नष्ट नहीं हुआ। चंद्रमा चतुर्थ में हों तो कांसा नष्ट नहीं हुआ ऐसा बताना चाहिये । राहु सप्तम में हो तो रांगा और कांसा नहीं नष्ट हुए । पंचम में सूर्य हो तो पित्तल नष्ट नहीं हुआ। दशमे पापसंयुक्ते न नष्टं च चतुष्पदं । बन्धनादि भवेयुः स्यात्तत्तद्विपदराशयः ॥ ३१ ॥
SR No.090186
Book TitleGyan Pradipika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamvyas Pandey
PublisherNirmalkumar Jain
Publication Year1934
Total Pages159
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size9 MB
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