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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ज्ञानप्रदोपिका। निधनारिधनस्थेषु पापेष्वशुभमादिशेत् । तन्वादिभावः पापैस्तु युक्तो दृष्टो विनश्यति ॥ १२ ॥ अष्टम, षष्ठ, द्वितीय में पाप ग्रह हों तो फल अशुभ होता है । पापग्रहाक्रान्त तन्वादि भाव अशुभ फल दायक हैं । शुभदृष्टो युतो वापि तत्तदभावादि भूषणम् । मेषोदये तुलारूढ़ नष्टं द्रव्यं न सिध्यति ॥ १३ ॥ शुभ से दृष्ट किंवा युक्त होने पर भाव शुभ फलद होते हैं। मेष लग्न हो और तुला आरूढ़ हो तो नष्ट द्रव्य की सिद्धि नहीं होती । तुलोदये क्रियारूढ़ नष्टसिद्धिर्न संशयः । विपरीते न नष्टाप्तिर्वृषारूढ़ ऽलिभोदये ॥ १४ ॥ २६ किन्तु यदि तुला लग्न और मेष आरूढ़ हो तो अवश्य सिद्धि होती है। वृष आरूढ़ और वृश्चिक लग्न हो तो महा लाभ होता हैं । नष्टसिद्धिर्महालाभो विपरीते विपर्ययः । चापारूद नष्टसिद्धिर्भविता मिथुनोदये ||१५|| विपरीते न सिद्धिः स्यात् कर्कारूद मृगोदये । सिद्धिश्च विपरीते तु न सिध्यति न संशयः ॥ १६ ॥ किन्तु यदि वृष लग्न और वृश्चिक आरूढ़ हो तो सिद्धि नहीं होती । मिथुन लग्न में धनु आरूढ़ हो तो नष्ट सिद्धि होती हैं। उल्टा होने से फल उल्टा होता है। कर्क आरूढ़ हो मकर का उदय हो तो सिद्धि होती है । उल्टा होने से सिद्धि नहीं होती । सिंहोद घटारूढे नष्टसिद्धिर्न संशयः । विपरीते न सिद्धिः स्यात् झषारूढेंगनोदये ||१७|| नष्टसिद्धिर्विपर्ये (?) स्यात् दृष्टादृष्टेर्निरूपणम् । For Private and Personal Use Only लग्न सिंह हो आरूढ़ कुंभ हो तो सिद्धि और उल्टा होने से असिद्धि होती हैं । मीन आरूढ़ हो और कन्या लग्न हो तो नष्ट सिद्धि नहीं होती है ।
SR No.090186
Book TitleGyan Pradipika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamvyas Pandey
PublisherNirmalkumar Jain
Publication Year1934
Total Pages159
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size9 MB
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