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________________ ६२ ग्रन्थराज श्री पञ्चाध्यायी प्रश्न २० - देश किसे कहते हैं ? उत्तर - प्रदेशों के अभिन्न पिण्ड को देश या द्रव्य कहते हैं। प्रश्न २१ - देशांश किसे कहते हैं ? उत्तर - भिन्न-भिन्न प्रत्येक प्रदेश को देशांश या क्षेत्र कहते हैं । प्रश्न २२ - गुण किसे कहते हैं ? उत्तर - त्रिकाली शक्तियों को गुण या भाव कहते हैं । प्रश्न २३ - गांण किसे कहते हैं? उत्तर - गुण के एक-एक अविभाग प्रतिछेद को गुणांश या पर्याय कहते हैं। प्रश्न २४ - देश देशांश के मानने से क्या लाभ है ? उत्तर - देश से द्रव्य के अस्तित्व की प्रतीति होती है और देशांश के मानने से कायत्व-अकायत्व और महत्व अमहत्व का अनुमान होता है जैसे काल द्रव्य अकायत्व है और आत्मा कायत्व है तथा आकाश आत्मा से महान है। (२८, २९,३०) प्रश्न २५ - कायत्व, अकायत्व, महत्व, अमहत्व, किसे कहते हैं ? उत्तर - बहुप्रदेशी को कायत्व या अस्तिकाय कहते हैं और अप्रदेशी अर्थात् एक प्रदेशी को अकायत्व कहते हैं। बड़े छोटे के परिज्ञान को महत्त्व, अमहत्व कहते हैं। प्रश्न २६ - गुण गुणांश के मानने से क्या लाभ है ? उत्तर - गुण दृष्टि से वस्तु अवस्थित-त्रिकाल एक रूप है, पर्याय दृष्टि से वस्तु अनवस्थित-समय समय भिन्न रूप है। इसका परिज्ञान होता है। (१९८) प्रश्न २७ - द्रव्य का स्वभाव क्या है ? -- द्रव्य स्वत:सिद्ध परिणामी है । 'स्थित रहता हुआ बदला करता है ' यही उसका स्वभाव है। इस स्वभाव के कारण ही वह गुणपर्यायमय या उत्पादव्ययधौव्यमय है। स्वतःसिद्ध स्वभाव के कारण उसमें गुण धर्म या धौव्यधर्म है। परिणमन स्वभाव के कारण उसमें पर्यायधर्म या उत्पाद व्यय धर्म है। (८९, १७८) प्रश्न २८ - द्रव्य और पर्याय दोनों मानने की क्या आवश्यकता है? (६४) उत्तर - द्रव्य दृष्टि से वस्तु अवस्थित है और पर्याय दृष्टि से वस्तु अनवस्थित है। द्रव्य दृष्टि को निश्चय दृष्टि, अन्वय दृष्टि, सामान्य दृष्टि भी कहते हैं। पर्याय दृष्टि को अवस्था दृष्टि, विशेष दृष्टि, व्यवहार दृष्टि भी कहते (६५, ६६, ६७) प्रश्न २९ - अवस्थित अनवस्थित से क्या समझते हो? उत्तर - यह द्रव्य वही का वही' और 'वैसा का वैसा ही है इसको अवस्थित कहते हैं अर्थात् द्रव्य का त्रिकाली स्वरूप सदा एक जैसा रहता है । इस अपेक्षा वस्तु अवस्थित है तथा प्रत्येक समय पर्याय में हीनाधिक परिणमन हुआ करता है, इस अपेक्षा अनवस्थित है। प्रश्न ३० - अवस्थित न मानने से क्या हानि है ? उत्तर - मोक्ष का पुरुषार्थ ज्ञानी किसके आश्रय से करेंगे? किसी के भी नहीं। प्रश्न ३१ - अनवस्थित न मानने से क्या हानि है ? उत्तर - मोक्ष और संसार का अन्तर मिट जायेगा, मोक्ष का पुरुषार्थ व्यर्थ हो जायेगा ।
SR No.090184
Book TitleGranthraj Shri Pacchadhyayi
Original Sutra AuthorAmrutchandracharya
Author
PublisherDigambar Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year
Total Pages559
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size18 MB
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