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________________ द्वितीय खण्ड/चौधी पुस्तक दूसरे आधे का अर्थ-यदि उपरक्ति रूप कारण नहीं है तो उसके कार्य भूत नौ तत्वों का अस्तित्व भी सिद्ध न होने पर अनादर न्याय से ही सिद्ध नहीं होता। भावार्थ-जब उपरक्ति कोई वस्तु नहीं तो फिर उसके कार्य भूत ९ तत्व भी कोई वस्त नहीं रहते, फिर यह कहना कि ये हेय हैं। सम्यक्त्व का विषय नहीं है- नहीं बनता क्योंकि जो है ही नहीं, उनके विषय में हेयफ्ना कैसा? सत्यामुपरक्तौ तस्यां नादेयानि पदानि वै । शुद्धादन्यत्र सर्वत्र नयरयानधिकारतः ॥ ९१२॥ शंका चालू - अब अपनी पहली बात का समर्थन करता हुआ कहता है कि यदि उपरक्ति रूप कारण है और उसके रहने पर ये कार्य भूत नौ पद भी हैं तो भी उनको परमागम में उपादेय तो कहा नहीं है क्योंकि शुद्ध नय का शुद्ध से अन्यत्र सर्वत्र (उपरक्ति अथवा नौ पदार्थों में) अधिकार नहीं कहा गया है। भावार्थ-यदि उपरक्ति है और उसके कार्य भूत नौ पद भी हैं तो भी सम्यक्त्व का विषय न होने से उनका कहना तो निरर्थक ही है। इस प्रकार उसने ९ तत्वों के होने पर भी उनमें अवाच्यता सिद्ध की । असत्यामुपरक्तौ वा नैवामूनि पदानि च 1 हेतुशून्याविनाभूतकार्यशून्यस्य दर्शनात् ॥ २१३ ।। शंका चालू-अब अपनी दूसरी बात के समर्थन में कहता है कि यदि उपरक्ति रूप कारण नहीं है तो उसके नहीं रहने पर तो ये कार्य भूत नव पदार्थ हो नहीं बनते क्योंकिकार के अभाव में उसके विनाभूत कार्य का भी अभाव देखा जाता है और जो नहीं है उसके कहने से भी क्या ? इस प्रकार उसने फिर नौ तत्त्वों में अवाच्यता सिद्ध की। उभयं चेत् कमेणेह सिद्धं न्यायाद्विवक्षितम् । शुद्धमात्रमुपादेयं हेयं शुद्धेतरं तदा ॥ ९१४ ॥ का चाल-यदि उपरक्ति रूप कारण के कार्यभत नौ पदार्थ और शद्ध तत्त्व दोनों क्रम से हैं तो न्याय से हमारा इष्ट सिद्ध हो गया क्योंकि शुद्धमात्र उपादेय है और शुद्ध से भिन्न ( उपरक्ति अथवा नव पदार्थ) हेय हैं। भावार्थ-जब दोनों कम से उत्पन्न होंगे तो जिस समय शद्ध उत्पन्न होगा उस समय सम्यक्त्व का विषय होने से ग्रामा होगा और जिस समय उपरक्ति वा नौ तत्व उत्पन्न होंगे वह हेय होगा-फिर उस हेय के कहने से क्या लाभ? इस प्रकार उसने नौ पदार्थों में फिर अवाच्यता सिद्ध की। योगपद्येऽपि तद्वैतं न समीहितसिद्धये । केवल शुद्धमादेयं नादेयं तत् परं यतः ॥ ९१५ ॥ शंका चालू-यदि शुद्धतत्व तथा उपरक्ति के कार्यभूत नौ पदार्थ दोनों इकट्ठे हैं तो भी इष्ट सिद्धि के लिये नहीं है अर्थात् फिर भी नौ पदार्थों में वाच्यता सिद्ध नहीं होती है क्योंकि केवल शुद्ध उपादेय है और उससे भिन्न उपरक्ति तथा नौ पदार्थ उपादेय नहीं हैं हेय हैं। भावार्थ-जब वे एक साथ दोनों भिन्न-भिन्न हैं तो सम्यक्त्व का विषय शुद्ध ले लेंगे। उपरक्ति अथवा नौ तत्त्व हेय होने से छोड़ देंगे फिर उनके कहने की क्या आवश्यकता है। उसने फिर नव पदार्थों में अवाच्यता सिद्ध की। जैकस्यैकपदेस्तो दे किये वा कर्मणी ततः । योगपद्यमसिद्ध स्याद् द्वैताद्वैतस्य का कथा || ९१६ ॥ शंका चालू- (दूसरी बात यह है कि) एक ( पदार्थ ) के एक पर्याय में दो क्रिया अथवा दो कर्म (कार्य) ही नहीं बनते हैं (एक नी पदार्थ रूप कार्य-एक शुद्ध तत्व रूप कार्य) |जब उन दोनों का युगपत्पना ही असिद्ध है फिर द्वैत(नौ पदार्थ हेय हैं) और अद्वैत (शुद्धतत्व उपादेय हैं) इनकी क्या चर्चा? अर्थात् जब दोनों का एकसाथ अस्तित्व ही नहीं बनता फिर वाच्यता का प्रश्नही क्या ? उसने फिर अवाच्यता सिद्ध की। ततोऽनन्यगतेायाच्छुद्धः सम्यक्त्वगोचरः । तद्वाचकश्च यः कोऽपि वाच्यः शुद्धनयोऽपि सः ॥ ९१७ ।।
SR No.090184
Book TitleGranthraj Shri Pacchadhyayi
Original Sutra AuthorAmrutchandracharya
Author
PublisherDigambar Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year
Total Pages559
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size18 MB
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