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________________ प्रन्धराज श्री पञ्चाध्यायी ५८८ से ५१६ तक का सार द्रव्य किसे कहते हैं ? उत्तर यही है कि अनन्त गुणों के समुदाय को द्रव्य कहते हैं। बस अनन्त गुणों का समुदाय रूप जो अखण्ड वह एक वहशी को बसाय हो हैं . सराको नियम मारने वाला द्रव्यार्थिक नय है और जिन अनन्त गुणों का वह समुदाय है उन अनन्त गुणों को निरूपण करने वाले अनन्त नय हैं। एक-एक गुणको विषय कर वाला एक-एक नय है। जो गुण का नाम है वही नय का नाम है। ये सब नय पर्यायार्थिक नय या व्यवहार नय कहलाते हैं क्योंकि ये एक एक अंश को विषय करते हैं। अब क्योंकि ये निरूपण तो अपने-अपने गुण को भिन्न-भिन्न करते हैं और हैं वे सब गुण अभिन्न ।अत: वे नय परस्पर सापेक्ष अर्थात् उसी प्रकार जुड़े हुये हैं जैसे द्रव्य में गुण हैं। इसलिये सापेक्ष कहने वाले हैं तो सम्यक् ( सच्चे) हैं अन्यथा मिथ्या हैं क्योंकि वे कहते भिन्न-भिन्न हैं और वस्तु अभिन्न है। जो अखण्ड समुदाय है वही तो भिन्न-भिन्न अनन्त गुण हैं। और जो भिन्न-भित्र अनन्त गुण हैं वही तो अखण्ड समदाय है। समदाय अर्थात सामान्य द्रव्य, गण अर्थात विशेष-पर्याय इसी का नाम सामान्य विशेष में सापेक्षताअबिनाभाव-परस्पर अनन्यथा सिद्धि है। ये एक-दूसरे के बिना सिद्ध नहीं हो सकते । छठा अवान्तर अधिकार प्रतिज्ञा ननु चोक्तलक्षण इति यदि न द्रव्यार्थिको नयो नियमात् । कोऽसौ व्यार्थिक इति पृष्टान्तच्चिन्हमाहराचार्याः ॥ ५९७॥ अर्थ-यदि उपर्युक्त लक्षण वाला द्रव्याधिक नय वास्तव में नहीं है तो फिर द्रव्यार्थिक नय कौन है? इस प्रकार किसी ने आचार्य से प्रश्न किया। सो अब आचार्य उस द्रव्यार्थिक नय का लक्षण कहते हैं। भावार्थ-यदि सोदाहरण विशेषण विशेष्य रूप सब ही नय नियम से पर्यायार्थिक नय ( व्यवहार नय) हैं - द्रव्यार्थिक नहीं (निश्चय नय नहीं ) तो बतलाइये द्रव्यार्थिक नय ( निश्चय नय ) किसे कहते हैं ? निश्चय नय का लक्षण तथा वाच्य पदार्थ व्यवहारः प्रतिषेध्यस्तस्य प्रतिषेधकश्च परमार्थः । व्यवहारपतिषेधः स एव निश्चयनयस्य वाच्यः स्यात् ।। ५९८॥ अर्थ-व्यवहार प्रतिषेध्य है अर्थात् निषेध करने योग्य है और उसका प्रतिषेधक अर्थात् निषेध करने वाला निश्चय है। जो व्यवहारका निषेध है वह भी निश्चय नय का वाच्य-अर्थ है। अन्तर इतना है कि वह भेद रूप नहीं अभेदरूप है। भावार्थ-द्रव्य शब्द का शब्दार्थ अन्वय या सामान्य होता है। इससे सिद्ध होता है कि द्रव्यार्थिक नय सत् में किसी प्रकार का भेद किये बिना उसे सामान्य रूप से ही ग्रहण करता है। यदि वस्तु का विधिमुखेन कथन किया जाता है तो वह धर्म विशेष द्वारा ही हो सकता है किन्तु धर्मविशेष द्वारा वस्तु का वाचक द्रव्यार्थिक नय न होकर पर्यायार्थिक नय है। इससे ग्रन्थकार ने पर्यायार्थिक नय को विशेषण विशेष्य रूप और द्रव्यार्थिक नय को इसका निषेधक बतलाया विचार करने पर जीव है या जीव चैतन्य गुणवाला है" व्यवहार नय के उदाहरण ठहरते हैं और 'न तथा' यह निश्चय नय का उदाहरण ठहरता है क्योंकि इसके सिवाय अन्य प्रकार से निश्चय नय के विषय का निर्देश नहीं किया जा सकता। इसी का स्पष्टीकरण व्यवहारः स यथा स्यात्सद्दव्य ज्ञानतांश्च जीठो ता। नेत्येतावान्मायो भवति स निश्चयनयो जयाधिपतिः॥ ५९९ ॥ अर्थ-व्यवहार नय इस प्रकार विवेचन करता है अथवा जानता है कि द्रव्य सत् रूप है। निश्चय नय: कि नहीं। व्यवहारनय बतलाता है कि जीव ज्ञानवान है निश्चय नय बतलाता है कि नहीं। इस प्रकार जो "नेति" ऐसा नहीं है अर्थात् निषेध को विषय करने वाला है वह निश्चय नय है और यही सब नयों का शिरोमणि है।
SR No.090184
Book TitleGranthraj Shri Pacchadhyayi
Original Sutra AuthorAmrutchandracharya
Author
PublisherDigambar Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year
Total Pages559
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size18 MB
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